सोमवार, मई 24, 2010

मां का जन्म


मां होने का अहसास सिर्फ ईश्वर के बराबर होने जैसा सुखदायी ही नहीं है,जीवन देने और उसे संवारने की संतुष्टि मां शब्दों में नहीं बांट सकती।समय ने मां की भूमिका में भारी बदलाव भले ही ला दिये हों,आधुनिक मां सुपर मॉम बनने की धुन में अनजाने ही नयी परिभाषाएं गढती जा रही है।वह भावनात्मक रूप से बच्चों के और भी ज्यादा करीब है और उनके फिजिकल डेवलपमेंट के साथ ही मेंटल फिटनेस के लिए भी हर तरह से तैयार है

अनुभा खुश थी। कुछ महीनों पहले। सब उसकी चिंता करते थे। सब उसे अटेंशन देते थे। डॉक्टर से लेकर पति, रिश्तेदार सब उसकी हिमायत करने में लगे रहते थे। यहां तक कि बाजार में अपरिचित भी उसे आराम करने की सलाह देते थे। बस में वह सफर करती तो उसे तुरंत सीट मिल जाती। अनुभा को यह सब अच्छा लगता था। उसके अंदर कोई नया आकार जो ले रहा था। लेकिन यह क्या! उसकी प्यारी-सी बच्ची के जन्म लेने के बाद उसे महसूस होने लगा मानो वह उस दायरे से बाहर आ गई हो। अब उसे सारे काम खुद करने पड़ते। नौकरी पर जाना, लंच तैयार करना। लंच पैक करने से लेकर सास-ससुर के लिए लंच बनाकर जाना। शॉपिंग करना, बिल जमा करना, गैस के लिए नंबर लगाना-लाना, बिल्कुल उसी तरह से जैसे वह पहले किया करती थी। अनुभा को ऐसा लगने लगा मानो जिसके लिए उसे सबसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए, वह कोई फैक्टर ही नहीं है।

ऐसा सिर्फ अनुभा के साथ ही नहीं होता, मां बन चुकी अधिकतर महिलाएं ऐसा ही महसूस करती हैं, क्योंकि उनके साथ ऐसा ही होता है। नौकरी पर जाती मां हो या घर में रहने वाली, बच्चे की जिम्मेदारी सौ फीसद उसके पास होती है। दिन भर ऑफिस-घर के काम के बाद जब रात को नींद आती है तो भी बच्चे का रोना उसे जगा डालता है। ऐसे में नई मां को कोफ्त तो होगी ही। लेकिन अफसोस, उसकी इस कोफ्त की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। अब वो बात ही नहीं रही कि आप संयुक्त परिवार में रह रहे हों और आपके बच्चे की देखभाल के लिए कई लोग हों। इस खालीपन को भरने के लिए पिता का रोल जरूरी हो जाता है, जो किया नहीं जाता। औसत मां अपने पार्टनर से प्रति सप्ताह 20 घंटे अधिक काम करती है। भले ही उसे पे-चेक मिल रहा हो या नहीं।

बच्चे की देखभाल करना, उसे संभालना-संवारना निश्चित तौर पर कीमती काम है लेकिन इसके भी इफेक्ट्स हैं। कई बार मांएं बच्चे को संभालते-संभालते टूटने लगती हैं। और यदि उसे जगह बदलनी हो, ऑफिस जाना हो या बच्चा टेंपरामेंटल हो तो उसकी वाट लगने से कोई नहीं रोक पाता। कई अध्ययन बताते हैं कि यदि महिला को एक या दो बच्चे हों, खासकर तब जब उसे सपोर्ट करने के लिए कोई न हो तो थकान, डिप्रेशन,एंजायटी,टाइप 2 डायबिटीज, न्यूट्रिशनल डेफिसिट जैसे फिजिकल और मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स होने की आशंका काफी हद तक बढ़ जाती है। सेक्स में अरुचि और लड़ाई-झगड़े भी होने लगते हैं। यानी कि अधिकतर मांएं पैरेंटिंग के शुरुआती दिनों में फिजिकली और साइकोलॉजिकली डिप्लेटेड (शून्य) महसूस करती हैं। इसे डिप्लेटेड मदर सिंड्रोम कहते हैं। मां के लिए यह किसी भी लिहाज से सही नहीं है। यह न तो बच्चे के लिए अच्छा है और न उनके पापा के लिए। सबसे अच्छा तो यह हो कि पापा भी बच्चे के लालन-पालन में समय दें। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो पिता परिवार की रोजाना के काम-काज में जुड़े रहते हैं, बच्चे की मां के साथ जिनका जुड़ाव होता है,उनका मूड अधिकतर समय अच्छा रहता है। वे अपने पार्टनर के साथ अधिक संतुष्टमय जिंदगी बिताते हैं।

सबसे बुरी स्थिति तो मां की होती है। न तो वह अपना ख्याल रख पाती है, न ही ऑफिस में काम पर ध्यान दे पाती है, बल्कि पति से उसकी दूरी तलाक की ओर बढ़ने लगती है।दिक्कत तो यह भी है कि कम ही संस्थानों या अस्पतालों में इस मामले को तवज्जो दी जाती है कि परिवार को बढ़ाने और चलाने की जिम्मेदार मां की मदद कैसे की जाए। इसके साइकोलॉजिकल पहलू पर किसी का ध्यान नहीं जाता। अभी भी मांओं को केवल यही कहा जाता है कि "यह सब केवल तुम्हारे दिमाग में है,इससे मुक्ति पाओ'। दूसरी ओर, मीडिया के बढ़ते प्रपंच ने आम मांओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे "मॉडल मदर' की तरह नहीं है, जो फुल-टाइम जॉब करती हैं, जिनके क्यूट और वेल-मैनर्ड बच्चे हैं,जिनकी किचन सिंक हमेशा चमकती रहती है। कई स्तरों खासकर पिता, एक्सटेंडेड फैमिली और सरकारी सुविधाएं ना के बराबर मिलती हैं। अधिकतर मांएं बच्चों को अच्छी जिंदगी देने और अपने करियर को अच्छी तरह से चलाने के बीच फंस जाती हैं। टूटने लगती हैं, बिखरने लगती हैं। अंत में जो कम्प्रमाइज वे करती हैं, उसके बाद भी उनमें से कुछ ही खुश रह पाती हैं।

इतने टूटन और बिखराव के बाद भी मांओं को गिल्ट महसूस होता है कि उन्होंने "अपने लिए' क्यों ऐसा किया। क्यों खुद के लिए उन्होंने कुछ लेना चाहा, समय निकाला, दूसरों की मदद ली आदि। हमारी संस्कृति हो या परिवार की स्थिति, या फिर सरकार की पॉलिसी, इसे बदलने में अभी काफी समय है। मुखर होकर बोला जाए तो कई पिता तो अब भी खुद उठकर सूरज की रोशनी तक नहीं देख पाते।मांएं ही उठती हैं, लंबी सांस लेती हैं, उनींदी होती हुई खड़ी भी होती हैं और फिर काम में लग जाती हैं।अफसोस तो यह है कि इनके लिए कोई खड़ा नहीं होता। इनकी परवाह लोग नहीं करते। इन्हें खुशनुमा महसूस हो, इसके लिए कोई कवायद नहीं करता।

3 टिप्‍पणियां:

geeta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Renu ने कहा…

very true... It happens always like this only. We are also a part of this. But I strongly feel one thing that if mother is not at home with her children, it makes really a lot of difference in the mental growth of the children.

ashish ने कहा…

veri good...........