सोमवार, अगस्त 09, 2010

तीखा नमक


टूटती बिखरती
एक स्त्री
नहीं जानती
नहीं मानती
दुनिया के तमाम थपेड़े
जो कर देते हैं होम उसे
जला डालते हैं
मन को
रूखे कर जाते हैं
हाथ की कोमलता
होठों की अरुणाई
और माथे का उत्थान
उत्थान नहीं रह जाता
वो तो सपाट हो गया है
आँखें भी अब
चंचल नहीं रही
उनमें समा गया है
नमक तीखा
देर तक
एहसास देता तीखेपन का
एड़ी भी अब
नरम कहाँ रही
दरारें हो गयी उनमें
नेह कहीं गया है दरक
क्या उसे रही
चाह ज्यादा की

7 टिप्‍पणियां:

arvind ने कहा…

हाथ की कोमलता
होठों की अरुणाई
और माथे का उत्थान
उत्थान नहीं रह जाता
वो तो सपाट हो गया है
...rachna me gahara dard jhalakta hai.

Forty something woman ने कहा…

Spardha aap bahut hi achha likhtee hain. I wish I could write like this :) Well written

dev ने कहा…

yah rachna kafi bhavukta me likhi gai hai. pahli bar pata chala aap ek achhi kavitri bhi hai.

good
davendra

विनीत उत्पल ने कहा…

मैं भावुक नहीं होना चाहता
मैं किसी को अपना दर्द बाँटना नहीं चाहता
मैं नहीं चाहता कि मेरे दर्द पर कोई हमदर्दी जताए
मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे टेसू पर अपनी टेसू बहाए
मैं नहीं चाहता कि मेरे दर्द से दूसरों को दर्द हो
मैं नहीं चाहता कि मेरे कराहने से किसी कि नींद खुल जाये
मैं नहीं चाहता कि सदियों से सोने वाले मेरे क्रुन्दन से जग जाये
मैं नहीं चाहता कि mere आहात से दुनिया में उथल-पुथल हो
क्योंकि सभी मृतक हैं
पूरा आश्मान गिद्धों से भरा है
और पूरी पृथ्वी श्मसान में तब्दील हो चुकी है
नहीं तो मेरा यह हस्र नहीं होता
और मैं यूँ ही नहीं भटक रहा होता
क्योंकि मेरे अन्दर भी कभी आग थी
जो अभी भी सुलग रही है
दुनिया बदलने को, नई राह चलने को.

suresh ने कहा…

बहुत सुंदर स्पर्धा जी ........बड़ी मार्मिक पंक्तियाँ दी हैं आपने ......बधाई

बेनामी ने कहा…

मै नही जानता की आप क्या कहना चाहती है पर जो दर्द दिखायी दे रहा है, उससे आप कुच्छ

संकेत करना चाहती है

बेनामी ने कहा…

मै नही जानता की आप क्या कहना चाहती है पर जो दर्द दिखायी दे रहा है, उससे आप कुच्छ

संकेत करना चाहती है