गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

बिगुल बजाती स्त्री


कोंकणा सेन शर्मा अपने पति को लेकर चिंतित है। वह विदेश में बैठी इंटरनेट के जरिए अपने पति को ढूंढ रही है। वह नहीं मिलता तो मोबाइल कंपनी के जरिए पता लगाती है कि वह भारत के किस कोने में है और उसे ढूंढती वहां आ पहुंचती है। फिल्म "7 खून माफ" में प्रियंका के अभिनय की तारीफ चारों ओर हो रही है, वहीं इस फिल्म में कोंकणा का यह कैमियो महिलाओं की बदलती स्थिति को जाहिर करता है। कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि समाज और महिलाओं की स्थिति उसी तरह बदल रही है, जिस तरह सिनेमा में उनके कैरेक्टर्स। आज से दस साल पहले यह उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी कि वह अपने पति को ढूंढने सात समन्दर पार पहुंच सकती है। कोंकणा ने न अपने किसी रिश्तेदार की मदद ली और न ही घर पर बैठी टेसुए ही बहाती रही। उसने वह उड़ान भरी, जो आज की महिलाओं की बिगुल बजाती आजादी और इंटेलिजेंस का प्रतीक है।

नई स्त्री का जन्म हो चुका है, वह घर पर बैठकर दीन-हीन महसूस करने की बजाय कमर कसकर बाहर निकलती है और अपने हक के लिए लड़ रही है। जिस तरह कोंकणा किसी और र महिला के हाथ में अपने पति को जाता देख साफ शब्दों में कह उठती है- यदि तुमने ऐसा सोचा भी तो मैं तुम्हारा मर्डर कर दूंगी। आज की लड़की बदल गई है, वह न तो रोती है और न ही धोखा बर्दाश्त करती है। न उसे खुद को लेकर कोई गलतफहमी है और न ही वह प्यार के नाम पर खुद को बलिदान करने को तैयार है। यह नई लड़की चारदीवारी में कैद भी नहीं है, अपने रास्ते खुद तलाश रही है। अपनी आजादी के मायने उसने ढूंढ लिये हैं। इसके लिए जरूरी नहीं कि उसे करोड़ रुपये और ऐशो-आराम की जिंदगी ही चाहिए। यह उदय सिर्फ मेट्रो में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी हो चुका है। गांव की स्त्री चूल्हा फूंकते हुए सोचती है कि कब उसकी रसोई में गैस आ पाएगी तो छोटे शहर की लड़की नौकरी करने के सपने दिन-रात देखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि बदलती स्त्री न केवल अपने लिए बदल रही है, बल्कि पूरे समाज में बदलाव देखने को वह छटपटा रही है।

गलतफहमी में रहने की आदत से वह खुद को मुक्ति दिला चुकी है। उसे पता है कि यदि उसने समय पर फलां काम नहीं किया तो देरी हो जाएगी। वह अपनी उम्र अब छिपाती नहीं, अपने सफेद बालों को काले रंग में रंगने को आतुर नहीं रहती। वह ढोल-नगाड़े के साथ सबको बताती है कि वह अब 30 के पायदान पर कदम रख चुकी है। कुछ ऐसा ही हालिया रिलीज फिल्म "टर्निंग 30' में दिखाया गया है। जो 30 पार कर चुकी हैं, उन्हें याद होगा कि जब वे तीस की होने वाली थी, लोगों ने उन्हें बार-बार याद दिलाया होगा कि अब तुम 30 की हो जाओगी, तुम्हें एक बच्चा और पैदा कर लेना चाहिए। छोटे शहरों में अब भी जो तीस की हो रही होंगी और उनकी शादी नहीं हुई होगी, उन्हें सुनाया जाता होगा कि तीस की हो गई और अब तक शादी नहीं हुई। हालांकि मेट्रो में 30 का होना अब कोई बड़ी बात नहीं रह गई है क्योंकि शादी की एवरेज उम्र 28 हो रही है। यह फिल्म नैना सिंह की कहानी है, जो तीस की हो रही है। उसकी मां उसे आए दिन सुनाती रहती है कि तुम तीस की होने आई, तुम्हें शादी करनी चाहिए। दूसरी ओर, नैना हर बार यही जवाब देती है कि तीस की होने का मतलब यह नहीं कि वह किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे से शादी कर लें, बजाए इसके उसे अकेले रहना पसंद है! यही नैना अपने काम का क्रेडिट किसी और के हाथ में जाते देख अपने बॉस को मिडिल फिंगर दिखाने में भी संकोच नहीं करती। मेट्रो में रह रही कई ऐसी लड़कियां हैं, जो आज कुछेक हजार कमाने की बजाए लाखों में कमाती हैं और अपने काम का क्रेडिट किसी और को देने को हरगिज तैयार नहीं हैं, न ही वह दबने को तैयार है। उसे पता है कि समाज को बदलने और खुद की अहमियत पाने के लिए उसे क्या करना है।

वह अब प्यार के चक्कर में नहीं पड़ती और न ही वह प्यार में धोखे खाती है, बल्कि वह प्यार को महसूसना और जीना चाहती है। अपने करियर के रास्ते वह प्यार को नहीं आने देती, बल्कि वह सब करती है जो अब तक पुरुष करते आए हैं। यही वजह है कि मधुर भंडारकर की फिल्म "दिल तो बच्चा है जी' की हीरोइन अपने प्रेमी के पीएफ के रुपये लेकर भाग निकलती है। वह प्यार को आड़े नहीं आने देती, बल्कि उसका लाभ उठाती है। जाहिर है, पुरुषवादी सोच रखने वालों को इस पर आपत्ति होगी और वह इसे गलत भी ठहराएंगे, जबकि सचाई यह है कि अब तक पुरुष जो करते आए हैं, वह अब नई लड़की ने करना शुरू कर दिया है। नई लड़की करियर को इस तरह महत्व देती है कि उसके लिए न केवल विदेश चली जाती है, बल्कि प्यार को भी न्योछावर करने में संकोच नहीं करती। "लव आजकल' की दीपिका का कैरेक्टर ऐसा ही है। वह अपने करियर के लिए बचपन के प्यार को ब्रोक देने में कोताही नहीं करती। नई लड़की को पता है कि उसे किस समय किस चीज की जरूरत ज्यादा है और किस समय उसका कौन सा कदम उसे ऊंचाइयों पर ले जाएगा। पहले की लड़की की तरह वह अपने करियर को सबसे पीछे नहीं रखती, बल्कि सबसे आगे रखती है। मां बन चुकी महिला भी अपने करियर को प्राथमिकता देती है। ऐसा नहीं है कि वह इसके लिए अपने बच्चे को तवज्जो नहीं देती या उसके साथ प्यार के दो पल नहीं बिताती, बल्कि यह कि वह अपने करियर को भी उतना ही महत्व देती है, जितना कि
और चीजों को। यूं तो समाज भी बदल रहा है। तभी तो सर्वे बताता है कि 56 फीसद भारतीय कंपनियां इस साल वर्किंग मॉम्स को नौकरी पर रखने को तैयार हैं। सर्वे में 10,000 बिजनेस रिस्पांडेंट्स ने हिस्सा लिया। यह कंपनियों की उस मानसिकता के परिचय का निचोड़ है, जिसमें पहले मांओं को नौकरी पर रखने से कंपनियां परहेज करती थीं। सर्वे के परिणाम के पीछे के कारण ढूंढे गये तो पता चला कि मां बन चुकी महिलाएं अपने काम के प्रति अधिक कमिटेड होती हैं।

अमिताभ बच्चन की फिल्म - "पा', में अमिताभ के अभिनय की तारीफों के पुल बांधे गए। इसमें उनकी मां का रोल विद्या बालन ने किया था, जो बिन ब्याही मां बनी थी। इस फिल्म में विद्या का कैरेक्टर प्रेगनेंट हो जाने पर न तो अबॉर्शन की सोचता है और न ही अपने प्रेमी से शादी करने के लिए उसके पैरों पर गिर जाता है। उल्टे, वह बड़ी दबंगई से कहती है- "तुमने अपना वीर्य मेरे अंदर डाल दिया, इससे ज्यादा तुमसे और कोई उम्मीद नहीं है।' यह कैरेक्टर आज से पांच साल पहले भी फिल्मों में नहीं था और न ही रीयल जिंदगी में। हां, यह बात अलग है कि करीब 25 साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने बिन ब्याही मां बनना स्वीकार किया और मसाबा को जन्म दिया। भले ही, उस समय नीना को इसके लिए बहुत कुछ सुनना पड़ा हो, लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि दिनोंदिन बढ़ते डिवोर्स, लिव-इन और एलजीबीटी की घटनाएं लड़कियों को इस तरह के कदम उठाने को प्रोत्साहित कर रही हैं। अखबार की एक खबर पर नजर डालें तो हमें पता चलता है कि दो लड़कियां मुंबई से आकर दिल्ली में इसलिए छिपी थीं क्योंकि उन्होंने साथ रहना पसंद किया। वे लेस्बियन हैं और उनका परिवार इसकी इजाजत नहीं देता। फिर भी, हिम्मत करके दोनों ने दिल्ली के एक एनजीओ का दरवाजा खटखटाया आैर शरण मांगी। यह नहीं कि ऐसा करके वे अपने परिवार को मुसीबत में डाल रही हों। उनका परिवार दिक्कत में न पड़े, इसलिए वह लिखकर आती है कि उसके जाने में उसके परिवार की कोई गलती नहीं है, उन्हें परेशानी में न डाला जाए बल्कि इसमें परिवार के लिए उनका प्यार झलकता है। दिक्कत यह है कि उनके इस प्यार को परिवार नहीं समझ रहा, वह तो बस समाज के डर से दबा किसी तरह उसे ले जाना चाह रहा है।


गांवों की स्त्रियां किस कदर बदल रही हैं, इसे नागेश कुकुनूर ने कुछ बरसों पहले रिलीज अपनी फिल्म "डोर' में दिखाया था। गुल पनाग और आएशा टाकिया की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म में शादी के शुरुआती दिनों में ही आएशा टाकिया विधवा हो जाती है। वह इसे अपनी नियति मानकर नहीं बैठ जाती, बल्कि हर उस चीज को इंज्वॉय करना चाहती है, जो उसकी उम्र की अन्य लड़कियां करती हैं। मौका मिलने पर वह इस बंधन से मुक्त पाने को केवल तैयार होती है, बल्कि निकल पड़ती है। यह स्त्री नई है, जिसके पास विचरने को खुला आकाश है और सींचने को नई जमीन। जो फिल्मकार अब तक रोती-बिसुरती पनाह मांगती औरत को परदे पर बेच रहे थे, उनको अपनी गलती का अहसास होना चाहिए वर्ना वे भी वैसे ही पिछड़ जाएंगे, जैसे और पारंपरिक चीजें।

6 टिप्‍पणियां:

Mugdha Mishra ने कहा…

Absolutely Liberating !!

Abhishek ने कहा…

Its the mirror of today's socety...

Ajay Gautam ने कहा…

the best out of a woman.....

शिल्पी रंजन ने कहा…

बेहतरीन लेख है। औरतों को लेकर समाज की परंपरावादी सोच में कहीं न कहीं बदलाव आ रहा है। तुम्हारा ये आलेख महिलाओं को जागरूक करने में अपनी निश्चित ही अहम भूमिका निभा रहा है।

joyita ghosh ने कहा…

बेहतरीन रचना। बिलकुल सही कहा.
सब कुछ करने में सक्षम है, नारी किसी भी अर्थ में पुरुष से कम नहीं है… और कभी यह भी कि नारी हर कार्य पुरुष से अधिक अच्छे ढंग से कर सकती है।

prashant nishant ने कहा…

bilkul sahi spardha ji.aapne naari ki present roop ka sahi varnan kiya hai