मंगलवार, नवंबर 30, 2010

कहानी रेत की

जाते समय तुम मेरी हंसी ले गए
मेरी मुस्कान भी चली गयी
अब तो इन्तेहा हो गयी
प्यार जैसे मर गया
रेत हो गयी मैं
भरभराती फिसलती
बिखरती उड़ती
धूसरित होती
रेत भी भला
क्या कभी हंसती है
स्वीकार लेती है बस उड़ना
बिखरना फिसलना

6 टिप्‍पणियां:

सुशील बाकलीवास ने कहा…

बढिया भावाभिव्यक्ति...

उपेन्द्र ने कहा…

sunder chitra ke sath gahre jajbat se likhi gayee sunder kavita..........

arvind ने कहा…

bahut badhiya abhivyakti....achhi post....subhkamanaaye.

विनीत उत्पल ने कहा…

bahut badhya. post ke bagal me dik rahi aap tasweer men kafi hans rahai hai. yakai aisa likhen jarur lekin hansti rahen jaise tasweer men hans rahi hain

abhi ने कहा…

रेत कब ठहरती है एक जगह...हाथों से फिसलती ही है बस.

shilpi ranjan prashant ने कहा…

बहुत सुंदर कविता है। वाकयी इसे कविता नहीं कहानी ही कही जानी चाहिए.. क्योंकि हर भावना शामिल है इसमें।