शुक्रवार, मार्च 05, 2010

ज़रूरी है उबरना


गिरिजा व्यास, अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग


महिलाओं के उत्थान की लगातार बातें होती रहती हैं। कागजों से लेकर चैनल्स पर इसकी बहस चलती है लेकिन होता वही है ढाक के तीन पात। दरअसल महिला होना ही अपने आपमें सबसे बड़ी दिक्कत है। सदियों बाद भी महिलाओं को दोयम दर्जा ही प्राप्त है। चाहे घर हो, परिवार हो, भारत हो या यूरोप, अमेरिका, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। सीमोन द बुआ ने इसलिए कहा था कि महिलाएं चाहे जहां भी रहें, उन्हें पता नहीं होती कि उनकी सुबह कहां होगी। सीता से लेकर द्रौपदी तक, सभी अनिश्चय के दरवाजे पर खड़ी रहती हैं। अप स्थिति में थोड़ा अंतर तो आया है, लेकिन सामाजिक, पारिवारिक,आर्थिक स्वतंत्रता होने के बावजूद पुरानी बेड़ियां अब तक उनके पांवों में जकड़ी हुई हैं। इससे उबरना जरूरी है।


दरअसल इन सारी परेशानियों के बीज कहीं न कहीं महिलाओं के अंतर्मन में गहरे छिपे हैं। वह खुद स्वीकार नहीं कर पाती कि उसे इन रुढ़ियों से उबरना होगा। जरूरत यह है कि महिला खुद अपनी मानसिकता को परिवर्तित करे। वह खुद सारी परिस्थितियों को झेलने के लिए मजबूर हैं। उसे यह समझने की आवश्यकता है कि दूसरों की जिम्मेदारी के साथ वह खुद का दायित्व भी समझे। खुद के अस्तित्व को सिद्ध करने के प्रयास में वह लगातार झेलने को मजबूर है। समाज भी कम नहीं। वह लगातार उसी पर लांछन लगाता है। उसी को "विक्टिम माना जाता है। इसलिए हमने "सेव द फैमिली' कैम्पेन चलाया है। घरेलू हिंसा का एक्ट बनाया है। इसमें लगातार सुधार किए जा रहे हैं। फिर भी नये साल के इन दो महीनों में कई मामले हमारी जानकारी में आए हैं। घरेलू हिंसा और वैवाहिक विवाद के कुल मामले जनवरी माह में 194 और फरवरी माह में 104 सामने आए हैं। मुझे अफसोस है कि सरकार द्वारा उठाए जा रहे इन कदमों के बावजूद हमारे यहां घरेलू हिंसा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। हां, यह जरूर है कि जनवरी में एक भी नहीं और फरवरी में केवल एक ही दहेज का मामला सामने आया है। दिक्कत तो पूरे पारिवारिक और सामाजिक ढांचे में ही है। यदि यह सब कुछ स्त्रियों के साथ पुरुषों को भी समझ आ जाए तो फिर कोई परेशानी ही क्या!


पारिवारिक संस्था हमेशा बनी रहे, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कई प्रयास किए हैं। सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि माध्यम के जरिए पति-पत्नी की काउंसलिंग की जाए और उनके बीच के विवाद को समाप्त करने के प्रयास हों। इन दिनों जो एकल परिवार हैं, उन्हें ध्यान में रखकर ही सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम उठाया है। पहले तो संयुक्त परिवार की धारणा थी, वहां परिवार के बीच ही काउंसलिंग हो जाया करती थी। घर बसे और स्त्री आराम से जीवन व्यापन करे, इसी की ख्वाहिश है। रियलिटी शोज में महिलाओं के अश्लील प्रदर्शन को लेकर भी हमने लगातार आवाज उठाया है। "इनडिसेंट प्रेजेंटेशन इन मीडिया' कानून भी इससे लगातार इनकार करता है। इस पर तो रोक लगना ही चाहिए। पर जरूरी तो स्व नियंत्रण भी है। चैलों के साथ इन शोज को बनाने वाले निर्माताओं को चाहिए कि वे इसे रोकने हेतु कदम उठाएं। लड़कियों में भी यह समझ हो कि वे खुद को वस्तु न समझें।


राजनीति में महिलाएं आगे आ सकें, इसके लिए संसद में तो उन्हें आरक्षण मिल रहा है। अब जरूरत है शिक्षा और नौकरी में उनहें आरक्षण मिले। हालांकि कई राज्य शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों को आरक्षण दे रहे हैं लेकिन पूरे देश में अब तक यह लागू नहीं हुआ है। यदि लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हों, सक्षम हों तो फिर उनके जीवन में कष्ट वाले दर्दनाक पल कम ही आएंगे। मेरे जीवन में कई ऐसे दर्दनाक मामले आए हैं, जिन्हें देख-सुन और जानकर मेरी रूह कांप गई है। पहला, दोनों बांहें कटी औरत को पशु की तरह खाना दिया जाता था। उसके साथ यूं अत्याचार किया जाता था मानो वह पशु हो। दूसरा, सात साल की मानसिक विकलांग बच्ची के साथ कई बार रेप किया गया। तीसरा, रात के दो बजे कड़कड़ाती ठंड और गिरती बर्फ में अमेरिका में एक महिला को घर से बाहर निकाल दिया गया। ये सारे मामले दुहराए न जाएं, इसके लिए पांच बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है-

1। कड़ा कानून

2। कानून पालन करने वाले यानी पुलिस का संवेदनशील होना

3। जागरुकता, जो नहीं है

4। नागरिक समाज की भूमिका

5। मीडिया की भूमिका

अभी हमारी बोतल आधी भरी है। जिस देश में राष्ट्रपति महिला हों, लोकसभा स्पीकर महिला हों, विपक्ष नेता महिला हो, उस देश में अब समय आ गया है कि स्त्री अपनी खोल से बाहर निकले।


5 टिप्‍पणियां:

मृत्युंजय ने कहा…

उम्दा महिलाओं की हालत आज़ादी के इतने दशक बाद भी जस की तस है
शहरी हो या ग्रामीण समाज दोनों जगहों पर एक जैसे हालात हैं
आपका यह लेख निश्चय ही मन को कचोटता है. ऐसे ही लिखते रहें

pyar se pukar lo ने कहा…

प्रिय,
आपके शब्द सौलह आना सत्य हैं...

Singh ने कहा…

jai ho satya ki

गुरु-घंटाल ने कहा…

Women should be more independent through education and jobs. In the Vedic era, women used to move freely in the society without any fear of any untoward incident. Nowadays, the women are not safe even in their homes.

Shilpi Ranjan Prashant ने कहा…

सही लिखा है....महिलाओं की इस स्थिति के लिए कई जगहों पर हम खुद भी जिम्मेदार हैं। घर से मोहल्ले तक, संसद से सड़क तक कई मोर्चों पर महिलाओं की बेचारगी उसक अपना चुना गया रास्ता है। जरूरत है अपने हक के लिए आवाज़ उठाने की और जरूरत पड़ने पर पूरे सिस्टम से लड़ने की।