सोमवार, मई 24, 2010

मेरी हिता....


मेरी सहेली गीता ने ये कविता बड़े प्यार से लिखी है...



कूदती फांदती,

नाक बहती

दांत खुजाती

कब गोद में आओगी...........

गुन गुने हाथों से

मेरे दूध को बोलो कब तुम सह्लओगी.......

पैर कब लगेंगे,

कब हाथ होंगे बड़े,

और तब तुम आकर

मेरे आँचल में छिप जाना

हम तुम मिलकर

तब लुका छिपी खेलेंगे.....

लव, धोखा और धोखेबाज


लिव-इन रिलेशन को लेकर कोर्ट ने छूट दे दी है। उन थकाऊ और उबाऊ लोगों के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया है, जो इसके खिलाफ बोलते रहे हैं। निश्चित तौर पर कोर्ट का यह फैसला पुरातनपंथी सोच वालों के गले नहीं उतर रहा। लिव-इन का पुरजोर समर्थन करने वाले खुश हैं लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चाहे लिव-इन हो या कोई अन्य रिश्ता, तमाम रिश्तों में धोखा देना आम बात हो गई है। अभी एक सप्ताह पहले ही खबर आई थी कि किस तरह ग्रेटर नोएडा में लिव-इन में रह रहे लड़के ने लड़की को धोखा दे दिया। मामला पुलिस थाने तक जा पहुंचा। यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी रिश्ते में धोखा हुआ करते थे। अब भी होते हैं। बस अंतर यह है कि अब सामने आने लगे हैं। लोगों में हिम्मत बढ़ गई है।

लिव-इन का जोर इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। दिल्ली में रहने वाली रोमा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे एक दिन प्रशांत का साथ छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। रोमा ने प्रशांत की हरसंभव देखभाल की। उसकी नौकरी न रहने पर उसका फोन बिल जमा कराने से लेकर उसके तनाव को झेला भी लेकिन रोमा को अंतत: कुछ हासिल नहीं हुआ। एक दिन प्रशांत ने कह दिया कि अब वह उसके साथ रिश्ता नहीं रखना चाहता। उसने कभी भी रोमा को चाहा ही नहीं। रोमा के पास सिवाए रोने के कोई और चारा ही नहीं था। लाख पूछने पर प्रशांत ने केवल यह बताया कि वह उसके टाइप की नहीं है। यह केवल रोमा और प्रशांत की कहानी नहीं है। धोखाधड़ी केवल लिव-इन या वैवाहिक रिश्ते में ही नहीं होती। भाई-बहन, दोस्त, मां-बच्चे के रिश्ते में भी धोखाधड़ी की पूरी आशंका रहती है। धोखा केवल स्त्री ही नहीं, पुरुषों को भी मिलता है। और धोखा केवल पुरुष ही नहीं, स्त्री भी देती है। बस अंतर यह होता है कि लड़कियां बेहद इमोशनल होती हैं, वे दिल से ज्यादा और दिमाग से कम सोचती हैं। उन पर समाज का इतना अधिक दबाव होता है कि इस बारे में सोचकर भी कुछ कर नहीं पातीं। दिमाग में कुछ आया नहीं कि उन विचारों को झटकने में लग जाती हैं।

तमाम आंकड़े और शोध भी बताते हैं कि लड़कियां दिमाग से कम और दिल से ज्यादा सोचती हैं। औसत तौर पर देखा जाए तो करीब 87 फीसद महिलाएं स्वीकारती हैं कि वे चाहकर भी अपने रिश्ते को छोड़ नहीं पातीं। धोखाधड़ी और चोरी के मामले में चाहे धोखा स्त्री ने दिया हो या पुरुष ने, धोखे का खामियाजा केवल स्त्री को ही उठाना पड़ता है। वह न केवल इमोशनल तौर पर टूटती-बिखरती है, बल्कि सामाजिक दायरे में भी उसे ही सब बर्दाश्त करना पड़ता है। यदि पुरुष ने उसे धोखा दिया है तो उसके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। उसे महसूस होता है कि वह जहां भी जाएगी, सब उससे उस पुरुष के बारे में पूछेंगे, जिसने उसे छोड़ दिया है। यदि उसने धोखा दिया है तो भी उसी से ऐसे सवाल किए जाएंगे। उससे पूछा जाएगा कि आखिर उस पुरुष में क्या कमी थी जो उसने उसे छोड़ने की हिम्मत दिखाई। दोनों स्थितियों में लोग-समाज उसे ही दोष देंगे। तरह-तरह की उपाधियों से नवाजेंगे।
हाँ , यह जरूर है कि इन दिनों युवाओं के विचार में धोखा देने, लेने और महसूस करने के मायने जरूर बदल गए हैं। नई जेनरेशन के लिए धोखा करने का मतलब कोई बड़ा तूफान नहीं होता। जहां भी आप अपने को, अपनी भावनाओं को ठगा हुआ पाते हैं, वहीं आहट महसूस करते हैं। आप जिसके साथ रूम मेट के तौर पर रहते हैं, वहां भी धोखा चुभता है। फिर रिश्ते तो मन से जुड़े होते हैं। गहरे संबंध हों चाहे मामूली सा सहकर्मी, जब जुड़ाव होने लगता है तो तब ईमानदारी की उम्मीद भी होती है। यकीन जरा सा भी टूटे तो किरच चुभती ही है। कभी तो संभल जाते हैं। कभी घाव गहरे हो जाते हैं। देखा जाए तो धोखाधड़ी स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसकी कोई सटीक परिभाषा नहीं है और न ही खांचा। यह कभी भी किसी के मन में आ सकता है। सही तरह से समझने की कोशिश की जाए तो यह काफी हद तक व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है। कई बार तो रिश्ते में स्पेस न मिलने की वजह से भी मन भागने लगता है। हर समय सवालों का जो फंदा सामने रहता है, उससे मन ऊब की ओर बढ़ता है। कई बार तो सामने वाले की अपेक्षाओं पर आप लगातार नहीं उतर पाते हैं तो भी रिश्ता टूटन की ओर बढ़ने लगता है। इसलिए बेहतर तो यह है कि आप अपने रिश्ते में रोमांच को बनाए रखें।

अब रश्मि और दीप्ति की दोस्ती को ही लें। दोनों एक-दूसरे के साथ करीब आठ साल से हैं। दोनों पक्के दोस्त हैं, बल्कि परिवार कहना ज्यादा बेहतर होगा। दीप्ति की जिंदगी में किसी का आगमन हुआ। जाहिर सी बात है दोनों का मिलना थोड़ा कम हो गया। रश्मि आठ साल की अपनी दोस्ती को यूं थोड़ा भी अलग होता नहीं देख पाई। वह बार-बार दीप्ति को फोन मिलाती और पूछती रहती कि वह कहां है। स्पेस न मिलने से दीप्ति का नाराज होना स्वाभाविक था। फलत: दीप्ति रश्मि से दूर होने लगी। यह स्पेस किसी भी रिश्ते को बनाए रखने, जोड़े रखने के लिए बेहद जरूरी होता है। रिश्ते में धोखा न हो, इसलिए बातचीत की पूरी आजादी होनी चाहिए। क्योंकि कहते हैं न कि बात करने से ही बात शुरू होती है।

मां का जन्म


मां होने का अहसास सिर्फ ईश्वर के बराबर होने जैसा सुखदायी ही नहीं है,जीवन देने और उसे संवारने की संतुष्टि मां शब्दों में नहीं बांट सकती।समय ने मां की भूमिका में भारी बदलाव भले ही ला दिये हों,आधुनिक मां सुपर मॉम बनने की धुन में अनजाने ही नयी परिभाषाएं गढती जा रही है।वह भावनात्मक रूप से बच्चों के और भी ज्यादा करीब है और उनके फिजिकल डेवलपमेंट के साथ ही मेंटल फिटनेस के लिए भी हर तरह से तैयार है

अनुभा खुश थी। कुछ महीनों पहले। सब उसकी चिंता करते थे। सब उसे अटेंशन देते थे। डॉक्टर से लेकर पति, रिश्तेदार सब उसकी हिमायत करने में लगे रहते थे। यहां तक कि बाजार में अपरिचित भी उसे आराम करने की सलाह देते थे। बस में वह सफर करती तो उसे तुरंत सीट मिल जाती। अनुभा को यह सब अच्छा लगता था। उसके अंदर कोई नया आकार जो ले रहा था। लेकिन यह क्या! उसकी प्यारी-सी बच्ची के जन्म लेने के बाद उसे महसूस होने लगा मानो वह उस दायरे से बाहर आ गई हो। अब उसे सारे काम खुद करने पड़ते। नौकरी पर जाना, लंच तैयार करना। लंच पैक करने से लेकर सास-ससुर के लिए लंच बनाकर जाना। शॉपिंग करना, बिल जमा करना, गैस के लिए नंबर लगाना-लाना, बिल्कुल उसी तरह से जैसे वह पहले किया करती थी। अनुभा को ऐसा लगने लगा मानो जिसके लिए उसे सबसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए, वह कोई फैक्टर ही नहीं है।

ऐसा सिर्फ अनुभा के साथ ही नहीं होता, मां बन चुकी अधिकतर महिलाएं ऐसा ही महसूस करती हैं, क्योंकि उनके साथ ऐसा ही होता है। नौकरी पर जाती मां हो या घर में रहने वाली, बच्चे की जिम्मेदारी सौ फीसद उसके पास होती है। दिन भर ऑफिस-घर के काम के बाद जब रात को नींद आती है तो भी बच्चे का रोना उसे जगा डालता है। ऐसे में नई मां को कोफ्त तो होगी ही। लेकिन अफसोस, उसकी इस कोफ्त की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। अब वो बात ही नहीं रही कि आप संयुक्त परिवार में रह रहे हों और आपके बच्चे की देखभाल के लिए कई लोग हों। इस खालीपन को भरने के लिए पिता का रोल जरूरी हो जाता है, जो किया नहीं जाता। औसत मां अपने पार्टनर से प्रति सप्ताह 20 घंटे अधिक काम करती है। भले ही उसे पे-चेक मिल रहा हो या नहीं।

बच्चे की देखभाल करना, उसे संभालना-संवारना निश्चित तौर पर कीमती काम है लेकिन इसके भी इफेक्ट्स हैं। कई बार मांएं बच्चे को संभालते-संभालते टूटने लगती हैं। और यदि उसे जगह बदलनी हो, ऑफिस जाना हो या बच्चा टेंपरामेंटल हो तो उसकी वाट लगने से कोई नहीं रोक पाता। कई अध्ययन बताते हैं कि यदि महिला को एक या दो बच्चे हों, खासकर तब जब उसे सपोर्ट करने के लिए कोई न हो तो थकान, डिप्रेशन,एंजायटी,टाइप 2 डायबिटीज, न्यूट्रिशनल डेफिसिट जैसे फिजिकल और मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स होने की आशंका काफी हद तक बढ़ जाती है। सेक्स में अरुचि और लड़ाई-झगड़े भी होने लगते हैं। यानी कि अधिकतर मांएं पैरेंटिंग के शुरुआती दिनों में फिजिकली और साइकोलॉजिकली डिप्लेटेड (शून्य) महसूस करती हैं। इसे डिप्लेटेड मदर सिंड्रोम कहते हैं। मां के लिए यह किसी भी लिहाज से सही नहीं है। यह न तो बच्चे के लिए अच्छा है और न उनके पापा के लिए। सबसे अच्छा तो यह हो कि पापा भी बच्चे के लालन-पालन में समय दें। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो पिता परिवार की रोजाना के काम-काज में जुड़े रहते हैं, बच्चे की मां के साथ जिनका जुड़ाव होता है,उनका मूड अधिकतर समय अच्छा रहता है। वे अपने पार्टनर के साथ अधिक संतुष्टमय जिंदगी बिताते हैं।

सबसे बुरी स्थिति तो मां की होती है। न तो वह अपना ख्याल रख पाती है, न ही ऑफिस में काम पर ध्यान दे पाती है, बल्कि पति से उसकी दूरी तलाक की ओर बढ़ने लगती है।दिक्कत तो यह भी है कि कम ही संस्थानों या अस्पतालों में इस मामले को तवज्जो दी जाती है कि परिवार को बढ़ाने और चलाने की जिम्मेदार मां की मदद कैसे की जाए। इसके साइकोलॉजिकल पहलू पर किसी का ध्यान नहीं जाता। अभी भी मांओं को केवल यही कहा जाता है कि "यह सब केवल तुम्हारे दिमाग में है,इससे मुक्ति पाओ'। दूसरी ओर, मीडिया के बढ़ते प्रपंच ने आम मांओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे "मॉडल मदर' की तरह नहीं है, जो फुल-टाइम जॉब करती हैं, जिनके क्यूट और वेल-मैनर्ड बच्चे हैं,जिनकी किचन सिंक हमेशा चमकती रहती है। कई स्तरों खासकर पिता, एक्सटेंडेड फैमिली और सरकारी सुविधाएं ना के बराबर मिलती हैं। अधिकतर मांएं बच्चों को अच्छी जिंदगी देने और अपने करियर को अच्छी तरह से चलाने के बीच फंस जाती हैं। टूटने लगती हैं, बिखरने लगती हैं। अंत में जो कम्प्रमाइज वे करती हैं, उसके बाद भी उनमें से कुछ ही खुश रह पाती हैं।

इतने टूटन और बिखराव के बाद भी मांओं को गिल्ट महसूस होता है कि उन्होंने "अपने लिए' क्यों ऐसा किया। क्यों खुद के लिए उन्होंने कुछ लेना चाहा, समय निकाला, दूसरों की मदद ली आदि। हमारी संस्कृति हो या परिवार की स्थिति, या फिर सरकार की पॉलिसी, इसे बदलने में अभी काफी समय है। मुखर होकर बोला जाए तो कई पिता तो अब भी खुद उठकर सूरज की रोशनी तक नहीं देख पाते।मांएं ही उठती हैं, लंबी सांस लेती हैं, उनींदी होती हुई खड़ी भी होती हैं और फिर काम में लग जाती हैं।अफसोस तो यह है कि इनके लिए कोई खड़ा नहीं होता। इनकी परवाह लोग नहीं करते। इन्हें खुशनुमा महसूस हो, इसके लिए कोई कवायद नहीं करता।

बुधवार, मई 05, 2010

नहीं तुम


तुम नहीं थे
मंद बहती बयार में
तेज चलते अंधड़ में
न तो उस आइसक्रीम में
जो तुमने मुझे दी थी खाने
एक बार नहीं कई-कई बार

तुम वहाँ भी नहीं थे
जिसे मैंने सबसे अपना माना
जहां मैं कई-कई बार जाती हूँ
देखती हूँ उस रास्ते पर
जहां तुम मुझे रिदा छोड़ गए थे
उन गलियों में जहां तुमने
पिलाई थी मुझे
अपने वे मीठे बोल
वह हंसी
जो देर तक अब तक
गूंजती रहती है मेरे कानों में

तुम नहीं हो
वहाँ जो मेरा शरीर है
जहां तुम्हारी अनुभूति है
जहां तुमने कभी स्पर्श किया था
तुम्हारी वो हलकी छुवन
मेरे गालों पर अब भी बसी
तुम क्यों नहीं हो वहाँ
जहां मेरी साँसे होकर भी नहीं हैं
मेरे आंसू हैं जहां
मेरे थरथराते होंठ
कापते हाथ पर
जहां अब भी तुम्हारा स्पर्श है






शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

MISS PR--सुपहरहिट


आखिर कभी सोचा है कि पीआर क्षेत्र में महिलाओं का बोलबाला क्यों है?आखिर क्यों हर पीआर एजेंसी में शीर्ष से लेकर ट्रेनी तक लड़कियों ने ही मोर्चा थाम रखा है? आखिर क्यों हर सफल व्यक्ति या कंपनी के पीछे किसी पीआर महिला का ही हाथ होता है।

कंट्रोल करने की शक्ति, स्वभाव में गर्माहट, कम्यूनिकेशन स्किल, तमीज, मेहनती

ऐसे गुणों की फेहरिस्त तैयार की जाए तो पुरुष ही पीछे हैं। इन सारे गुणों की वजह से ही महिलाएं बाजी मार रही हैं। पारिवारिक व्यवस्था में भी विश्वास और मल्टीटाÏस्कग के गुण ही महिला को शीर्ष पर आसीन करते हैं। ये सारे गुण ही अब प्रोफेशनल माहौल में भी महिलाओं के रास्ते तय करने का कारण बनते जा रहे हैं। नये समझ में हर तरह की कंपनी में दो चीजों का बोलबाला होता है। पदृहला, पब्लिक रिलेशन और दूसरा ह्रूमन रिसोर्स। कंपनियों की चाहत होती है कि वे जो भी काम करें, उसका प्रचार-प्रसार बेहतरीन तरीके से हो। वे न केवल आर्थिक तौर पर विकास करें बल्कि उन्हें लोकप्रियता भी जमकर मिले। कंपनी की प्रोफाइल के हिसाब से यह काफी महत्व रखता है। विशेषकर प्रोडक्शन से जुड़ी कंपनियों के लिए तो यह बेहद जरूरी है।

यह काफी पुराना जुमला हो चुका है कि लोकप्रियता किसी की मोहताज नहीं। अब जमाना खुद को प्रमोट करने का है। जिसने खुद को प्रमोट नहीं किया, वह पीछे हो जाता है। यहीं रोल बनता है पब्लिक रिलेशन प्रोफेशनल यानी पीआर का। महिलाओं के गुण उन्हें बेहतरीन पीआर बनाने का माद्दा रखते हैं। फिर चाहे किसी कंपनी को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचना हो या किसी कलाकार को नंबर एक की कुर्सी पानी हो। पीआर यदि महिला हो तो उसे लोगों के दिल में बसने से कोई रोक नहीं सकता। कई फिल्म और टीवी कलाकारों की पीआर मोनिका भट्टाचार्य का नाम इस लिहाज से उल्लेखनीय है। मोनिका को इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा अपनी मां से मिली। मोनिका कहती हैं, "महिलाओं का आईक्यू अच्छा होता है। उनमें एक साथ कई काम करने का माद्दा होता है। हां, यह बात जरूर दीगर है कि बतौर महिला मुझे कई चैलेंज का सामना भी करना पड़ता है।' मोनिका की बात से इत्तिफाक रखती हुई मीडिया स्ट्रेटेजिस्ट दीपिका सिंह कहती हैं, "इस क्षेत्र में काम करने का सबसे बड़ा चैलेंज यात्रा करना है। घर के साथ ऑफिस को तो फिर भी संभाला जा सकता है। लेकिन बार-बार शहर से बाहर जाने में कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार छोटे शहरों का दौरा भी करने की जरूरत पड़ती है।' इतनी दिक्कतों के बावजूद भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि कड़ी मेहनत करने का जज्बा और दूसरों के साथ जल्दी घुल-मिल की प्रवृत्ति महिलाओं को पीआर क्षेत्र में दिनोंदिन आगे बढ़ा रही है।

यूं तो अब तक इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया है। लेकिन अपने आस-पास नजर डालें तो हम पाएंगे कि पीआर एजेंसी या पीआर विभाग में काम करने वालों में करीब 80 फीसद संख्या महिलाओं की हैं। फिल्मों की बड़ी पीआर एजेंसी के एक मालिक अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि इतनी अधिक संख्या में महिलाओं के पीआर में होने का ही मतलब है कि उनमें गजब की काबिलियत है। ये लड़कियों के काम करने के स्टाइल की न केवल तारीफों के पुल बांधते है, बल्कि उन्हें मेहनती होने के तमगे से भी नवाजते हैं। सामने वाला व्यक्ति कितना भी व्यस्त क्यों न हो, लड़कियों से आसानी से फोन पर बातें कर लेता है। इन महाशय की बात सौ फीसद सच है। अब इसे पॉजिटिव सेंस में लें या किसी और सेंस में, लड़कियों से बातें करते समय कम ही लोग गुस्से में आते हैं। उनसे बदतमीजी नहीं करते और न ही उन्हें परेशान करते हैं। पुरुषों की इस मानसिकता के पीछे का कारण पीआर पंडित एजेंसी की पीआर प्रोफेशनल पारूल सूरी बखूबी समझाती हैं, "दरअसल लड़कियों में ही इतनी तमीज होती है कि सामने वाला नाराज हो ही नहीं सकता। न तो लड़कियां गुस्सा होती हैं और न ही सामने वाले को गुससा होने का मौका देती हैं। वे जो भी काम करती हैं, बेहद सोच-समझकर करती हैं। काम के प्रति उनमें समर्पण भाव तो होता ही है।' इतनी सारी खूबियां वाकई किसी महिला में ही हो सकती हैं। वरना पुरुष न केवल भावुक होते हैं, बल्कि उनमें क्रिएटिविटी की भी सीमा होती है।

फर्श से अर्श तक पहुंचने का सपना तो हर किसी में होता है लेकिन उस सपने को हकीकत में बदलना हर किसी के बस का नहीं। पीआर की सारी क्वालिटी किसी में हो और सपने को हकीकत में बदलने का जज्बा भी तो उसे क्या कहेंगे। दस सालों में अपनी पीआर कंपनी इंपैक्ट पब्लिक रिलेशंस खड़ी करने वाली कुलप्रीत कौर के हौसले आज भी उतने ही बुलंद हैं। कुलप्रीत किसी पीआर कंपनी में एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में थी। लेकिन वहां पीआर के काम करने लगीं। महसूस हुआ कि खुद ही कंपनी शुरू की जाए। बकौल कुलप्रीत, "अलग-अलग हिस्से में खुद को ढालने की क्षमता, कंट्रोल करने की शक्ति, धैर्य, बातें करने की क्षमता, स्वभाव में गर्माहट, मिलनसार, कम्यूनिकेशन स्किल जैसी खूबियों ने मेरा खूब साथ दिया।' खास तो यह है कि दूसरों की कंपनी और दूसरों को प्रमोट करने में कभी भी इन्हें नहीं महसूस हुआ कि ये खुद को प्रमोट करें। फिर चाहे मोनिका हों, दीपिका, पारूल या कुलप्रीत, दूसरों की सफलता के पीछे खही अपने अस्तित्व को नकारती नहीं। बल्कि दूसरों की सफलता पर इन्हें फक्र होता है। आखिर उनकी सफलता इनकी देन ही तो है।

सोमवार, अप्रैल 05, 2010

लहरें


कई बार मन में ख्याल उपजते हैं और फिर गुम भी हो जाते हैं। सोचती हूं कई बार और कई बार जूझती हूं। आखिर ये ख्याल आते ही क्यों हैं? और क्यों आकर मुझे विचलित कर जाते हैं। जीवन की सचाइयों से मैंने काफी कुछ सीखा है, वो भी काफी कम उम्र में। जिस उम्र में लड़कियां खिलखिलाती हैं, बचपने में रहती हैं, उस उम्र में मैंने अपनी खिलखिलाहट खो दी। एसा नहीं है कि मैंने अपनी खिलखिलाहट को बचाने की कोशिश नहीं की। एसा भी नहीं है कि मैं उलझती चली गई। उलझी जरूर लेकिन उससे निकलने का रास्ता भी मैंने ही ढूंढा। रात-रात भर खुद से सवाल पूछती रही कि मैं ही क्यों? जवाब मिले कई बार और कई दफा नहीं भी मिले। मिला तो दूर तक दिखता रास्ता, जिस पर मुझे कोई नहीं दिख रहा था।

मुझे हमेशा से एडवेंचर पसंद रहा है। दूर घुमावदार पहाड़ों तक निकल जाना या फिर आसमान को छूती पहाड़ियों तक पहुंचना। उससे भी ज्यादा पसंद रहा है समुद्र में खो जाना। समुद्र की गहराइयां मुझे खींचती हैं अपनी आ॓र। लगता है मानो मेरा कुछ हो वहां। जाना चाहती थी वहां, छूकर महसूस करना चाहती थी। आखिर कुछ तो है मेरा वहां। गई भी, मिला भी। पर रहा नहीं मेरे पास। मुझे छूकर निकल गया, बिल्कुल उसी तरह जैसे पानी हाथ को छूकर निकल जाता है। जैसे समुद्र किनारे पर आकर फिर लौट जाता है। किनारे पर चाहे जो भी लिख लो, आती लहरें उसे लेकर लौट ही जाती हैं।

लहरें, इनसे मेरा नाता पुराना रहा है। खूबसूरत लहरें, संगीतमय लहरें, उलझी सी सुलझी लहरें। कुछ दिन पहले ही पुरी जाना हुआ। लहरों से साक्षात्कार हुआ। लगा मानो मेरी पुरानी जान-पहचान हो। छूकर देखना चाहा, उसे अपनी गोद में समा लेना चाहा। पर लहरें कहां थमने वाली। हथेली में आईं, उंगलियों के पोरों से होते हुए मुझे छोड़कर निकल पड़ीं। मुझे रिदा कर गईं। पर मैं हार मानने वालों में नहीं हूं। मैं अकेले रास्ते पर चलने वालों में नहीं हूं। मुझमें इतनी कूवत है कि मैं निकल सकूं इसी रास्ते पर बिना झिझके, बिना ठहरे।

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

जायका बदल कर देखें


मेरी सहेली गीता ने ये कविता लिखी, जो मुझे बेहद पसंद आई.
पढ़ते के साथ मन में आया क्यों न इसे अपने ब्लॉग पर प्रेषित कर दूँ।


ये स्क्रिप्टेड,
हमारी तुम्हारी ज़िन्दगी
फाईव स्टार होटल सी
आज थोडा मेनू बदल कर देखें
अचार के साथ भर कर भात हो
पीली वाली दाल, अरहर की
एक के उपर एक चढ़ी दीवारों से निकल कर
थोडा जायका बदल कर देखें
बिल्डिंग में हमारी बहस टकराकर तितली होती
काओं काओं के अभ्यास से दूर
मेरे तुम्हारे में चाय सुडकने कि सनक तो रह जाये
वो भी कहीं टिप टिप के शोर में न दब जाये
टिक टिक पर चलने वाले हो गए
हम सब और सभी तो ऐसे होते जा रहे हैं
नमक मिर्च कम ज़यादा कर लेने में आपका मेरा क्या जाता है
एक बार आजमा लेते हैं