सोमवार, मई 24, 2010

मां का जन्म


मां होने का अहसास सिर्फ ईश्वर के बराबर होने जैसा सुखदायी ही नहीं है,जीवन देने और उसे संवारने की संतुष्टि मां शब्दों में नहीं बांट सकती।समय ने मां की भूमिका में भारी बदलाव भले ही ला दिये हों,आधुनिक मां सुपर मॉम बनने की धुन में अनजाने ही नयी परिभाषाएं गढती जा रही है।वह भावनात्मक रूप से बच्चों के और भी ज्यादा करीब है और उनके फिजिकल डेवलपमेंट के साथ ही मेंटल फिटनेस के लिए भी हर तरह से तैयार है

अनुभा खुश थी। कुछ महीनों पहले। सब उसकी चिंता करते थे। सब उसे अटेंशन देते थे। डॉक्टर से लेकर पति, रिश्तेदार सब उसकी हिमायत करने में लगे रहते थे। यहां तक कि बाजार में अपरिचित भी उसे आराम करने की सलाह देते थे। बस में वह सफर करती तो उसे तुरंत सीट मिल जाती। अनुभा को यह सब अच्छा लगता था। उसके अंदर कोई नया आकार जो ले रहा था। लेकिन यह क्या! उसकी प्यारी-सी बच्ची के जन्म लेने के बाद उसे महसूस होने लगा मानो वह उस दायरे से बाहर आ गई हो। अब उसे सारे काम खुद करने पड़ते। नौकरी पर जाना, लंच तैयार करना। लंच पैक करने से लेकर सास-ससुर के लिए लंच बनाकर जाना। शॉपिंग करना, बिल जमा करना, गैस के लिए नंबर लगाना-लाना, बिल्कुल उसी तरह से जैसे वह पहले किया करती थी। अनुभा को ऐसा लगने लगा मानो जिसके लिए उसे सबसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए, वह कोई फैक्टर ही नहीं है।

ऐसा सिर्फ अनुभा के साथ ही नहीं होता, मां बन चुकी अधिकतर महिलाएं ऐसा ही महसूस करती हैं, क्योंकि उनके साथ ऐसा ही होता है। नौकरी पर जाती मां हो या घर में रहने वाली, बच्चे की जिम्मेदारी सौ फीसद उसके पास होती है। दिन भर ऑफिस-घर के काम के बाद जब रात को नींद आती है तो भी बच्चे का रोना उसे जगा डालता है। ऐसे में नई मां को कोफ्त तो होगी ही। लेकिन अफसोस, उसकी इस कोफ्त की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। अब वो बात ही नहीं रही कि आप संयुक्त परिवार में रह रहे हों और आपके बच्चे की देखभाल के लिए कई लोग हों। इस खालीपन को भरने के लिए पिता का रोल जरूरी हो जाता है, जो किया नहीं जाता। औसत मां अपने पार्टनर से प्रति सप्ताह 20 घंटे अधिक काम करती है। भले ही उसे पे-चेक मिल रहा हो या नहीं।

बच्चे की देखभाल करना, उसे संभालना-संवारना निश्चित तौर पर कीमती काम है लेकिन इसके भी इफेक्ट्स हैं। कई बार मांएं बच्चे को संभालते-संभालते टूटने लगती हैं। और यदि उसे जगह बदलनी हो, ऑफिस जाना हो या बच्चा टेंपरामेंटल हो तो उसकी वाट लगने से कोई नहीं रोक पाता। कई अध्ययन बताते हैं कि यदि महिला को एक या दो बच्चे हों, खासकर तब जब उसे सपोर्ट करने के लिए कोई न हो तो थकान, डिप्रेशन,एंजायटी,टाइप 2 डायबिटीज, न्यूट्रिशनल डेफिसिट जैसे फिजिकल और मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स होने की आशंका काफी हद तक बढ़ जाती है। सेक्स में अरुचि और लड़ाई-झगड़े भी होने लगते हैं। यानी कि अधिकतर मांएं पैरेंटिंग के शुरुआती दिनों में फिजिकली और साइकोलॉजिकली डिप्लेटेड (शून्य) महसूस करती हैं। इसे डिप्लेटेड मदर सिंड्रोम कहते हैं। मां के लिए यह किसी भी लिहाज से सही नहीं है। यह न तो बच्चे के लिए अच्छा है और न उनके पापा के लिए। सबसे अच्छा तो यह हो कि पापा भी बच्चे के लालन-पालन में समय दें। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो पिता परिवार की रोजाना के काम-काज में जुड़े रहते हैं, बच्चे की मां के साथ जिनका जुड़ाव होता है,उनका मूड अधिकतर समय अच्छा रहता है। वे अपने पार्टनर के साथ अधिक संतुष्टमय जिंदगी बिताते हैं।

सबसे बुरी स्थिति तो मां की होती है। न तो वह अपना ख्याल रख पाती है, न ही ऑफिस में काम पर ध्यान दे पाती है, बल्कि पति से उसकी दूरी तलाक की ओर बढ़ने लगती है।दिक्कत तो यह भी है कि कम ही संस्थानों या अस्पतालों में इस मामले को तवज्जो दी जाती है कि परिवार को बढ़ाने और चलाने की जिम्मेदार मां की मदद कैसे की जाए। इसके साइकोलॉजिकल पहलू पर किसी का ध्यान नहीं जाता। अभी भी मांओं को केवल यही कहा जाता है कि "यह सब केवल तुम्हारे दिमाग में है,इससे मुक्ति पाओ'। दूसरी ओर, मीडिया के बढ़ते प्रपंच ने आम मांओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे "मॉडल मदर' की तरह नहीं है, जो फुल-टाइम जॉब करती हैं, जिनके क्यूट और वेल-मैनर्ड बच्चे हैं,जिनकी किचन सिंक हमेशा चमकती रहती है। कई स्तरों खासकर पिता, एक्सटेंडेड फैमिली और सरकारी सुविधाएं ना के बराबर मिलती हैं। अधिकतर मांएं बच्चों को अच्छी जिंदगी देने और अपने करियर को अच्छी तरह से चलाने के बीच फंस जाती हैं। टूटने लगती हैं, बिखरने लगती हैं। अंत में जो कम्प्रमाइज वे करती हैं, उसके बाद भी उनमें से कुछ ही खुश रह पाती हैं।

इतने टूटन और बिखराव के बाद भी मांओं को गिल्ट महसूस होता है कि उन्होंने "अपने लिए' क्यों ऐसा किया। क्यों खुद के लिए उन्होंने कुछ लेना चाहा, समय निकाला, दूसरों की मदद ली आदि। हमारी संस्कृति हो या परिवार की स्थिति, या फिर सरकार की पॉलिसी, इसे बदलने में अभी काफी समय है। मुखर होकर बोला जाए तो कई पिता तो अब भी खुद उठकर सूरज की रोशनी तक नहीं देख पाते।मांएं ही उठती हैं, लंबी सांस लेती हैं, उनींदी होती हुई खड़ी भी होती हैं और फिर काम में लग जाती हैं।अफसोस तो यह है कि इनके लिए कोई खड़ा नहीं होता। इनकी परवाह लोग नहीं करते। इन्हें खुशनुमा महसूस हो, इसके लिए कोई कवायद नहीं करता।

बुधवार, मई 05, 2010

नहीं तुम


तुम नहीं थे
मंद बहती बयार में
तेज चलते अंधड़ में
न तो उस आइसक्रीम में
जो तुमने मुझे दी थी खाने
एक बार नहीं कई-कई बार

तुम वहाँ भी नहीं थे
जिसे मैंने सबसे अपना माना
जहां मैं कई-कई बार जाती हूँ
देखती हूँ उस रास्ते पर
जहां तुम मुझे रिदा छोड़ गए थे
उन गलियों में जहां तुमने
पिलाई थी मुझे
अपने वे मीठे बोल
वह हंसी
जो देर तक अब तक
गूंजती रहती है मेरे कानों में

तुम नहीं हो
वहाँ जो मेरा शरीर है
जहां तुम्हारी अनुभूति है
जहां तुमने कभी स्पर्श किया था
तुम्हारी वो हलकी छुवन
मेरे गालों पर अब भी बसी
तुम क्यों नहीं हो वहाँ
जहां मेरी साँसे होकर भी नहीं हैं
मेरे आंसू हैं जहां
मेरे थरथराते होंठ
कापते हाथ पर
जहां अब भी तुम्हारा स्पर्श है






शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

MISS PR--सुपहरहिट


आखिर कभी सोचा है कि पीआर क्षेत्र में महिलाओं का बोलबाला क्यों है?आखिर क्यों हर पीआर एजेंसी में शीर्ष से लेकर ट्रेनी तक लड़कियों ने ही मोर्चा थाम रखा है? आखिर क्यों हर सफल व्यक्ति या कंपनी के पीछे किसी पीआर महिला का ही हाथ होता है।

कंट्रोल करने की शक्ति, स्वभाव में गर्माहट, कम्यूनिकेशन स्किल, तमीज, मेहनती

ऐसे गुणों की फेहरिस्त तैयार की जाए तो पुरुष ही पीछे हैं। इन सारे गुणों की वजह से ही महिलाएं बाजी मार रही हैं। पारिवारिक व्यवस्था में भी विश्वास और मल्टीटाÏस्कग के गुण ही महिला को शीर्ष पर आसीन करते हैं। ये सारे गुण ही अब प्रोफेशनल माहौल में भी महिलाओं के रास्ते तय करने का कारण बनते जा रहे हैं। नये समझ में हर तरह की कंपनी में दो चीजों का बोलबाला होता है। पदृहला, पब्लिक रिलेशन और दूसरा ह्रूमन रिसोर्स। कंपनियों की चाहत होती है कि वे जो भी काम करें, उसका प्रचार-प्रसार बेहतरीन तरीके से हो। वे न केवल आर्थिक तौर पर विकास करें बल्कि उन्हें लोकप्रियता भी जमकर मिले। कंपनी की प्रोफाइल के हिसाब से यह काफी महत्व रखता है। विशेषकर प्रोडक्शन से जुड़ी कंपनियों के लिए तो यह बेहद जरूरी है।

यह काफी पुराना जुमला हो चुका है कि लोकप्रियता किसी की मोहताज नहीं। अब जमाना खुद को प्रमोट करने का है। जिसने खुद को प्रमोट नहीं किया, वह पीछे हो जाता है। यहीं रोल बनता है पब्लिक रिलेशन प्रोफेशनल यानी पीआर का। महिलाओं के गुण उन्हें बेहतरीन पीआर बनाने का माद्दा रखते हैं। फिर चाहे किसी कंपनी को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचना हो या किसी कलाकार को नंबर एक की कुर्सी पानी हो। पीआर यदि महिला हो तो उसे लोगों के दिल में बसने से कोई रोक नहीं सकता। कई फिल्म और टीवी कलाकारों की पीआर मोनिका भट्टाचार्य का नाम इस लिहाज से उल्लेखनीय है। मोनिका को इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा अपनी मां से मिली। मोनिका कहती हैं, "महिलाओं का आईक्यू अच्छा होता है। उनमें एक साथ कई काम करने का माद्दा होता है। हां, यह बात जरूर दीगर है कि बतौर महिला मुझे कई चैलेंज का सामना भी करना पड़ता है।' मोनिका की बात से इत्तिफाक रखती हुई मीडिया स्ट्रेटेजिस्ट दीपिका सिंह कहती हैं, "इस क्षेत्र में काम करने का सबसे बड़ा चैलेंज यात्रा करना है। घर के साथ ऑफिस को तो फिर भी संभाला जा सकता है। लेकिन बार-बार शहर से बाहर जाने में कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार छोटे शहरों का दौरा भी करने की जरूरत पड़ती है।' इतनी दिक्कतों के बावजूद भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि कड़ी मेहनत करने का जज्बा और दूसरों के साथ जल्दी घुल-मिल की प्रवृत्ति महिलाओं को पीआर क्षेत्र में दिनोंदिन आगे बढ़ा रही है।

यूं तो अब तक इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया है। लेकिन अपने आस-पास नजर डालें तो हम पाएंगे कि पीआर एजेंसी या पीआर विभाग में काम करने वालों में करीब 80 फीसद संख्या महिलाओं की हैं। फिल्मों की बड़ी पीआर एजेंसी के एक मालिक अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि इतनी अधिक संख्या में महिलाओं के पीआर में होने का ही मतलब है कि उनमें गजब की काबिलियत है। ये लड़कियों के काम करने के स्टाइल की न केवल तारीफों के पुल बांधते है, बल्कि उन्हें मेहनती होने के तमगे से भी नवाजते हैं। सामने वाला व्यक्ति कितना भी व्यस्त क्यों न हो, लड़कियों से आसानी से फोन पर बातें कर लेता है। इन महाशय की बात सौ फीसद सच है। अब इसे पॉजिटिव सेंस में लें या किसी और सेंस में, लड़कियों से बातें करते समय कम ही लोग गुस्से में आते हैं। उनसे बदतमीजी नहीं करते और न ही उन्हें परेशान करते हैं। पुरुषों की इस मानसिकता के पीछे का कारण पीआर पंडित एजेंसी की पीआर प्रोफेशनल पारूल सूरी बखूबी समझाती हैं, "दरअसल लड़कियों में ही इतनी तमीज होती है कि सामने वाला नाराज हो ही नहीं सकता। न तो लड़कियां गुस्सा होती हैं और न ही सामने वाले को गुससा होने का मौका देती हैं। वे जो भी काम करती हैं, बेहद सोच-समझकर करती हैं। काम के प्रति उनमें समर्पण भाव तो होता ही है।' इतनी सारी खूबियां वाकई किसी महिला में ही हो सकती हैं। वरना पुरुष न केवल भावुक होते हैं, बल्कि उनमें क्रिएटिविटी की भी सीमा होती है।

फर्श से अर्श तक पहुंचने का सपना तो हर किसी में होता है लेकिन उस सपने को हकीकत में बदलना हर किसी के बस का नहीं। पीआर की सारी क्वालिटी किसी में हो और सपने को हकीकत में बदलने का जज्बा भी तो उसे क्या कहेंगे। दस सालों में अपनी पीआर कंपनी इंपैक्ट पब्लिक रिलेशंस खड़ी करने वाली कुलप्रीत कौर के हौसले आज भी उतने ही बुलंद हैं। कुलप्रीत किसी पीआर कंपनी में एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में थी। लेकिन वहां पीआर के काम करने लगीं। महसूस हुआ कि खुद ही कंपनी शुरू की जाए। बकौल कुलप्रीत, "अलग-अलग हिस्से में खुद को ढालने की क्षमता, कंट्रोल करने की शक्ति, धैर्य, बातें करने की क्षमता, स्वभाव में गर्माहट, मिलनसार, कम्यूनिकेशन स्किल जैसी खूबियों ने मेरा खूब साथ दिया।' खास तो यह है कि दूसरों की कंपनी और दूसरों को प्रमोट करने में कभी भी इन्हें नहीं महसूस हुआ कि ये खुद को प्रमोट करें। फिर चाहे मोनिका हों, दीपिका, पारूल या कुलप्रीत, दूसरों की सफलता के पीछे खही अपने अस्तित्व को नकारती नहीं। बल्कि दूसरों की सफलता पर इन्हें फक्र होता है। आखिर उनकी सफलता इनकी देन ही तो है।

सोमवार, अप्रैल 05, 2010

लहरें


कई बार मन में ख्याल उपजते हैं और फिर गुम भी हो जाते हैं। सोचती हूं कई बार और कई बार जूझती हूं। आखिर ये ख्याल आते ही क्यों हैं? और क्यों आकर मुझे विचलित कर जाते हैं। जीवन की सचाइयों से मैंने काफी कुछ सीखा है, वो भी काफी कम उम्र में। जिस उम्र में लड़कियां खिलखिलाती हैं, बचपने में रहती हैं, उस उम्र में मैंने अपनी खिलखिलाहट खो दी। एसा नहीं है कि मैंने अपनी खिलखिलाहट को बचाने की कोशिश नहीं की। एसा भी नहीं है कि मैं उलझती चली गई। उलझी जरूर लेकिन उससे निकलने का रास्ता भी मैंने ही ढूंढा। रात-रात भर खुद से सवाल पूछती रही कि मैं ही क्यों? जवाब मिले कई बार और कई दफा नहीं भी मिले। मिला तो दूर तक दिखता रास्ता, जिस पर मुझे कोई नहीं दिख रहा था।

मुझे हमेशा से एडवेंचर पसंद रहा है। दूर घुमावदार पहाड़ों तक निकल जाना या फिर आसमान को छूती पहाड़ियों तक पहुंचना। उससे भी ज्यादा पसंद रहा है समुद्र में खो जाना। समुद्र की गहराइयां मुझे खींचती हैं अपनी आ॓र। लगता है मानो मेरा कुछ हो वहां। जाना चाहती थी वहां, छूकर महसूस करना चाहती थी। आखिर कुछ तो है मेरा वहां। गई भी, मिला भी। पर रहा नहीं मेरे पास। मुझे छूकर निकल गया, बिल्कुल उसी तरह जैसे पानी हाथ को छूकर निकल जाता है। जैसे समुद्र किनारे पर आकर फिर लौट जाता है। किनारे पर चाहे जो भी लिख लो, आती लहरें उसे लेकर लौट ही जाती हैं।

लहरें, इनसे मेरा नाता पुराना रहा है। खूबसूरत लहरें, संगीतमय लहरें, उलझी सी सुलझी लहरें। कुछ दिन पहले ही पुरी जाना हुआ। लहरों से साक्षात्कार हुआ। लगा मानो मेरी पुरानी जान-पहचान हो। छूकर देखना चाहा, उसे अपनी गोद में समा लेना चाहा। पर लहरें कहां थमने वाली। हथेली में आईं, उंगलियों के पोरों से होते हुए मुझे छोड़कर निकल पड़ीं। मुझे रिदा कर गईं। पर मैं हार मानने वालों में नहीं हूं। मैं अकेले रास्ते पर चलने वालों में नहीं हूं। मुझमें इतनी कूवत है कि मैं निकल सकूं इसी रास्ते पर बिना झिझके, बिना ठहरे।

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

जायका बदल कर देखें


मेरी सहेली गीता ने ये कविता लिखी, जो मुझे बेहद पसंद आई.
पढ़ते के साथ मन में आया क्यों न इसे अपने ब्लॉग पर प्रेषित कर दूँ।


ये स्क्रिप्टेड,
हमारी तुम्हारी ज़िन्दगी
फाईव स्टार होटल सी
आज थोडा मेनू बदल कर देखें
अचार के साथ भर कर भात हो
पीली वाली दाल, अरहर की
एक के उपर एक चढ़ी दीवारों से निकल कर
थोडा जायका बदल कर देखें
बिल्डिंग में हमारी बहस टकराकर तितली होती
काओं काओं के अभ्यास से दूर
मेरे तुम्हारे में चाय सुडकने कि सनक तो रह जाये
वो भी कहीं टिप टिप के शोर में न दब जाये
टिक टिक पर चलने वाले हो गए
हम सब और सभी तो ऐसे होते जा रहे हैं
नमक मिर्च कम ज़यादा कर लेने में आपका मेरा क्या जाता है
एक बार आजमा लेते हैं

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

मैं स्वेच्छाचारी


तसलीमा नसरीन


बारिश और वज्रपात! इन्हीं सब में पिछले दिनों घर से निकल पड़ी। क्यों? बारिश में भीगने। क्यों? भीगोगी क्यों? इच्छा हो रही है!

इच्छा? जी, इच्छा!

लोग क्या सोचेंगे?क्यों सोचेंगे?

सोचेंगे, दिमाग खराब हो गया है! सोचने दो!बारिश में भीगोगी तो बीमार पड़ जाआ॓गी। कैसी बीमारी?सर्दी-बुखार! होने दो! इस उम्र में शोभा नहीं देता! किस उम्र में शोभा देता है?सोलह-सत्रह की उम्र होती, तो ठीक था। बहुतेरे लोगों की नजरों में यह भी ठीक नहीं। किस उम्र में क्या करना ठीक है, क्या गलत, किसने बनाई है यह लिस्ट? समाज ने!

समाज के लिए हम हैं या हमारे लिए समाज? नियम-कानून आखिर इंसान ही बनाता है न! इंसान ही उन्हें तोड़ता भी है। कोई भी नियम ज्यादा दिनों तक नहीं रहता।

हमारा संवाद इसके बाद और भी आगे बढ़ते हुए अंत में ‘स्वेच्छाचार’ पर आ थमा। ‘सवेच्छाचार’ शब्द का अर्थ, अगर ‘अपनी मन-मर्जी से काम करना’ हो (संसद बांग्ला शब्दकोश) तो मैं जरूर स्वेच्छाचारी हूं। शत-प्रतिशत! आखिर यह मेरी जिंदगी है। अपनी जिंदगी में, मैं क्या करूंगी, क्या नहीं करूंगी, यह फैसला मैं लूंगी। कोई दूसरा कौन लेगा? जिंदगी जिसकी है, बस उसी की है। अपनी जिंदगी में कौन, क्या करना चाहता है, इंसान को यह खुद जानना चाहिए। जिस इंसान में अभी तक कोई निजी इच्छा नहीं जागी, उसे मैं वयस्क इंसान नहीं कहूंगी। जो अभी तक अपनी मर्जी-मुताबिक नहीं चलता या चलने से डरता है, उसे मैं स्वस्थ दिमाग वाला इंसान नहीं मानती। अब सवाल यह उठता है कि अगर किसी के मन में किसी का खून करने की इच्छा सिर उठाए, तब अगर किसी के मन में बलात्कार करने की चाह जाग उठे तब? मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि जो स्वेच्छाचार दूसरों का नुकसान करे, उस स्वेच्छाचार में मेरा विश्वास नहीं है। वैसे अब इस नुकसान में भी फेर-बदल हो सकता है। अगर कोई यह कहे, ‘तुम धर्म की निंदा नहीं कर सकती क्योंकि तुम्हारी निंदा मेरी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाती है’, तब? किसी के शरीर पर आघात करने का मतलब अगर दूसरों को नुकसान पहुंचाना होता है तो मन पर आघात करने का मतलब दूसरों को नुकसान पहुंचाना क्यों नहीं होगा? इस मामले में मेरी राय है कि जिस इंसान के मन में अनेक तरह के कुसंस्कार और अज्ञान घर कर गये हैं, उन्हें दूर करना होगा। सजग-सचेतन इंसान की जिम्मेदारी है कि वह ये सब दूर करें। सवाल यह उठाया जा सकता है कि मैं अपने को सचेतन क्यों मान रही हूं और कट्टरवादी इंसान को सचेतन क्यों नहीं मानती? इसके पक्ष में मेरे पास सैकड़ों तर्क हैं। वैसे कट्टरवादी भी अपने-अपने तर्क पेश कर सकते हैं लेकिन मेरी जो विचार बुद्धि है, मैंने जो मूल्यबोध गढ़े हैं। उसके आधार पर मैं कट्टरपंथियों के तर्क को नितांत अवैज्ञानिक और बेतुका कह कर उनका खंडन करती हूं और अपनी राय पर स्थिर रह सकती हूं। जहां तक मेरा ख्याल है, मैं किसी के शरीर पर आघात नहीं करती, किसी भी सच्चे, ईमानदार इंसान के आर्थिक नुकसान की वजह नहीं बनती। अपनी स्वेच्छाचारिता को लेकर भी मुझे कभी, कोई पछतावा नहीं हुआ। आज तक कभी पछताना भी नहीं पड़ा समाज के अनगिनत ‘टैबू’ यानी रूढ़ियां मैंने तोड़ी हैं। लोगों ने इसे स्वेच्छाचार कहा, मैंने इसे अपनी आजादी माना। मैं अपने विवेक की नजर में बिल्कुल साफ और स्पष्ट हूं। मैं जो भी करती हूं, मेरी नजर में वह अन्याय या भूल नहीं है। अपनी नजर में ईमानदार और निरपराध बने रहने की कद्र बहुत ज्यादा है।

जब मैं किशोरी थी, कदम-कदम पर निषेधाज्ञा जारी थी। घर से बाहर मत जाना। खेलना-कूदना नहीं। सिनेमा-थियेटर मत जाता। छत पर मत जाना। पेड़ पर मत चढ़ना। किसी लड़के-छोकरे की तरफ आंख उठा कर मत देखना। किसी से प्रेम मत करना-लेकिन मैंने सब किया। मैंने किया, क्योंकि मेरा करने का मन हुआ। चूंकि मुझे मनाही थी इसलिए करने का मन हुआ, ऐसी बात नहीं थी। अब्बू तो मुझे और बहुत कुछ भी करने को मना करते थे। मसलन, पोखर में मत उतरना। मैं पोखर में नहीं उतरी क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता था। इस वजह से मुझे आशंका होती थी कि तैराकी सीखे बिना, अगर मैं पोखर में उतरी, तो मजा तो मिट्टी होगा ही। असावधानीवश मैं डूब भी सकती हूं। अब्बू की कड़ी हिदायत थी-छत की रेलिंग पर मत चढ़ना। मैं नहीं चढ़ी क्योंकि मुझे लगता था कि रेलिंग संकरी है, अगर कहीं फिसल कर नीचे जा पड़ी तो सर्वनाश। कोई भी काम करते हुए लोगों ने क्या कहा-क्या नहीं कहा, मैंने यह कभी नहीं देखा। मैंने यह देखा कि मैंने खुद को क्या तर्क दिये। अपनी चाह या इच्छा के सामने मैं पूरी ईमानदारी से खड़ी होती हूं। औरतों के लिए जिनकी इच्छा का मोल यह पुरूषतान्त्रिक समाज कभी नहीं देता। अपनी इच्छा को प्रतििष्ठत करना आसान नहीं है। लेकिन मुझे इन्हें प्रतििष्ठत न करने की कोई वजह नजर नहीं आती। अपना भयभीत, पराजित, नतमस्तक, हाथ जोड़े हुए यह रूप मेरी ही नजर को बर्दाश्त नहीं होगा, मैं जानती हूं। मेरी सारी लड़ाई सच के लिए है। मेरी जंग समानता और सुंदरता के लिए है। यह जंग करने के लिए मुझे स्वेच्छाचारी होना ही होगा। इसके बिना यह जंग नहीं की जा सकती। व्यक्तिगत जीवन में भी सिर ऊंचा करके खड़े होने के लिए स्वेच्छाचारी बनना ही होगा। अगर मैं दूसरों की इच्छा पर चलूं, तब तो मैं पर-निर्भर कहलाऊंगी। अगर मैं दूसरों की बुद्धि और विचार के मुताबिक चली तो मैं निश्चित तौर पर मानसिक रूप से पंगु हूं। अगर मुझे दूसरों की करूणा पर जिंदगी गुजारनी पडे़ तो मैं कुछ और भले होऊं, आत्मनिर्भर तो हरगिज नहीं हूं। जहां स्वेच्छाचार का आनन्द न हो, मुक्त चिंतन न हो, मुक्त बुद्धि न हो, तब तो मैं मशीनी यंत्र बन जाऊंगी। इस ख्याल से तो मेरी सांस घुटने लगती है। ऐसे दु:सह जीवन से तो मौत ही भली। मर्द बिरादरी तो चिरकाल से ही स्वेच्छाचार करती आ रही है। यह समूचा समाज ही उन लोगों के अधीन है। औरत के लिए स्वेच्छाचार जरूरी है। इच्छाओं की कोठरी में अगर ताला जड़ देना पड़े, ताला जड़कर इस समाज में तथाकथित भली लड़की, लक्ष्मी लड़की, जहीन लड़की, शरीफ औरत, नम्र औरत का रूप धारण करना पड़े-तो अब जरूरी हो आया है कि औरत अपने आंचल में बंधी हुई चाबी खोले। ताला खोलकर अपनी तमाम इच्छाएं पंछी की तरह समूचे आसमान में उड़ा दे। हर आ॓र सर्वत्र औरत स्वेच्छाचारी बन जाए वरना आजादी का मतलब उन लोगों की समझ में नहीं आएगा, वरना वे लोग जिंदगी की खूबसूरती के दर्शन नहीं कर पाएंगी।

आजादी का क्या अर्थ है, मैं जानती हूं। अजादी की जरूरत, मैं पल-पल महसूस करती हूं। भले मैं अकेली रहूं या दुकेली रहूं या हजारों लोगों की भीड़ में रहूं, मैं अपनी आजादी किसी को दान नहीं करती या कहीं खो नहीं देती। हां, मैं आजादी और अधिकार के बारे में लिखती हूं और जो लिखती हूं, उस पर विश्वास भी करती हूं। जो विश्वास करती हूं, वही जीती हूं। मानसिक तौर पर मैं सबल हूं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हूं और नैतिक रूप से आजाद इंसान हूं। मर्दों को यही बर्दाश्त नहीं होता। मर्द औरत में इतनी क्षमता पसंद नहीं करते। ये लोग औरत को अपने हाथों में ले कर या पैरों तले कुचल-पीस डालना चाहते हैं। जो पिस जाने से इनकार करती हैं वे बुरी हैं, वे भली औरत नहीं है। वे स्वेच्छाचारी हैं।

बहुतेरे लोगों की यह धारणा है कि स्वेच्छाचारी होने का मतलब है, किसी भी मर्द के साथ जब-तब सो जाना, सेक्स संबंध करना। लेकिन स्वेच्छाचार का यह अर्थ हरगिज नहीं है। बल्कि मर्दों के साथ न सोने को मैं स्वेच्छाचार मानती हूं। आम तौर पर नियम यही है कि औरत, मर्द के साथ सोए, मर्द की एक पुकार पर औरत चाहे जहां भी हो, उसके पास दौड़ कर चली आए। लेकिन सच तो यह है कि वही औरत स्वेच्छाचारी है जो इच्छा न हो, तो मर्द के साथ न सोए या सोने से इनकार कर दे! ऐसी स्वेच्छाचारी औरत को मर्द आखिर क्यों पसंद करने लगे? बहरहाल मर्द के सुख-भोग के लिए मर्द के तन-मन की तृप्ति के लिए मर्द की विकृति, ऐश-विलास मिटाने के लिए जो औरत अपने को लुटा न दे, मर्द उसे सिर्फ स्वेच्छाचारी ही नहीं, वेश्या तक कह कर उसका अपमान करने के लिए तैयार रहता है।

मेरा जो मन करता है, मैं वही करती हूं। हां, किसी का ध्वंस करके कुछ नहीं करती। चूंकि मैं स्वेच्छाचारी हूं, इसलिए जीवन का अर्थ और मूल्य, दोनों ही भली प्रकार समझ सकती हूं। अगर मैं स्वेच्छाचारी न होती, दूसरों की इच्छा-वेदी पर बलि हो गई होती, तो मुझ में यह समझने की ताकत कभी नहीं आती कि मैं कौन हूं, मैं क्यों हूं? इंसान अगर अपने को ही न पहचान पाए तो वह किसको पहचानेगा? आज अगर मैं स्वेच्छाचारी नहीं होती, तो शायद यह लेख, जो मैं लिख रही हूं उसका एक भी वाक्य नहीं लिख पाती।

ज़रूरी है उबरना


गिरिजा व्यास, अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग


महिलाओं के उत्थान की लगातार बातें होती रहती हैं। कागजों से लेकर चैनल्स पर इसकी बहस चलती है लेकिन होता वही है ढाक के तीन पात। दरअसल महिला होना ही अपने आपमें सबसे बड़ी दिक्कत है। सदियों बाद भी महिलाओं को दोयम दर्जा ही प्राप्त है। चाहे घर हो, परिवार हो, भारत हो या यूरोप, अमेरिका, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। सीमोन द बुआ ने इसलिए कहा था कि महिलाएं चाहे जहां भी रहें, उन्हें पता नहीं होती कि उनकी सुबह कहां होगी। सीता से लेकर द्रौपदी तक, सभी अनिश्चय के दरवाजे पर खड़ी रहती हैं। अप स्थिति में थोड़ा अंतर तो आया है, लेकिन सामाजिक, पारिवारिक,आर्थिक स्वतंत्रता होने के बावजूद पुरानी बेड़ियां अब तक उनके पांवों में जकड़ी हुई हैं। इससे उबरना जरूरी है।


दरअसल इन सारी परेशानियों के बीज कहीं न कहीं महिलाओं के अंतर्मन में गहरे छिपे हैं। वह खुद स्वीकार नहीं कर पाती कि उसे इन रुढ़ियों से उबरना होगा। जरूरत यह है कि महिला खुद अपनी मानसिकता को परिवर्तित करे। वह खुद सारी परिस्थितियों को झेलने के लिए मजबूर हैं। उसे यह समझने की आवश्यकता है कि दूसरों की जिम्मेदारी के साथ वह खुद का दायित्व भी समझे। खुद के अस्तित्व को सिद्ध करने के प्रयास में वह लगातार झेलने को मजबूर है। समाज भी कम नहीं। वह लगातार उसी पर लांछन लगाता है। उसी को "विक्टिम माना जाता है। इसलिए हमने "सेव द फैमिली' कैम्पेन चलाया है। घरेलू हिंसा का एक्ट बनाया है। इसमें लगातार सुधार किए जा रहे हैं। फिर भी नये साल के इन दो महीनों में कई मामले हमारी जानकारी में आए हैं। घरेलू हिंसा और वैवाहिक विवाद के कुल मामले जनवरी माह में 194 और फरवरी माह में 104 सामने आए हैं। मुझे अफसोस है कि सरकार द्वारा उठाए जा रहे इन कदमों के बावजूद हमारे यहां घरेलू हिंसा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। हां, यह जरूर है कि जनवरी में एक भी नहीं और फरवरी में केवल एक ही दहेज का मामला सामने आया है। दिक्कत तो पूरे पारिवारिक और सामाजिक ढांचे में ही है। यदि यह सब कुछ स्त्रियों के साथ पुरुषों को भी समझ आ जाए तो फिर कोई परेशानी ही क्या!


पारिवारिक संस्था हमेशा बनी रहे, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कई प्रयास किए हैं। सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि माध्यम के जरिए पति-पत्नी की काउंसलिंग की जाए और उनके बीच के विवाद को समाप्त करने के प्रयास हों। इन दिनों जो एकल परिवार हैं, उन्हें ध्यान में रखकर ही सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम उठाया है। पहले तो संयुक्त परिवार की धारणा थी, वहां परिवार के बीच ही काउंसलिंग हो जाया करती थी। घर बसे और स्त्री आराम से जीवन व्यापन करे, इसी की ख्वाहिश है। रियलिटी शोज में महिलाओं के अश्लील प्रदर्शन को लेकर भी हमने लगातार आवाज उठाया है। "इनडिसेंट प्रेजेंटेशन इन मीडिया' कानून भी इससे लगातार इनकार करता है। इस पर तो रोक लगना ही चाहिए। पर जरूरी तो स्व नियंत्रण भी है। चैलों के साथ इन शोज को बनाने वाले निर्माताओं को चाहिए कि वे इसे रोकने हेतु कदम उठाएं। लड़कियों में भी यह समझ हो कि वे खुद को वस्तु न समझें।


राजनीति में महिलाएं आगे आ सकें, इसके लिए संसद में तो उन्हें आरक्षण मिल रहा है। अब जरूरत है शिक्षा और नौकरी में उनहें आरक्षण मिले। हालांकि कई राज्य शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों को आरक्षण दे रहे हैं लेकिन पूरे देश में अब तक यह लागू नहीं हुआ है। यदि लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हों, सक्षम हों तो फिर उनके जीवन में कष्ट वाले दर्दनाक पल कम ही आएंगे। मेरे जीवन में कई ऐसे दर्दनाक मामले आए हैं, जिन्हें देख-सुन और जानकर मेरी रूह कांप गई है। पहला, दोनों बांहें कटी औरत को पशु की तरह खाना दिया जाता था। उसके साथ यूं अत्याचार किया जाता था मानो वह पशु हो। दूसरा, सात साल की मानसिक विकलांग बच्ची के साथ कई बार रेप किया गया। तीसरा, रात के दो बजे कड़कड़ाती ठंड और गिरती बर्फ में अमेरिका में एक महिला को घर से बाहर निकाल दिया गया। ये सारे मामले दुहराए न जाएं, इसके लिए पांच बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है-

1। कड़ा कानून

2। कानून पालन करने वाले यानी पुलिस का संवेदनशील होना

3। जागरुकता, जो नहीं है

4। नागरिक समाज की भूमिका

5। मीडिया की भूमिका

अभी हमारी बोतल आधी भरी है। जिस देश में राष्ट्रपति महिला हों, लोकसभा स्पीकर महिला हों, विपक्ष नेता महिला हो, उस देश में अब समय आ गया है कि स्त्री अपनी खोल से बाहर निकले।