शनिवार, मार्च 26, 2011

अनचीन्हा


दिल का बोझ और
दिमाग का धुंधलापन
अच्छा हुआ उतर गए
शाम के धुंधलके में
आँखों में उमड़ते आंसू
अक्सर यही तो कह जाते हैं

रात को सोयी उनींदी आंखें भी
चुपके से खुलकर यही कहती हैं
चारों ओर क़ी शांति में
भला कोलाहल कैसा
जो मेरे अन्दर घुसता जाता है
बार बार हर बार

थमते नहीं तो बस
मेरे अन्दर की शांति
मेरे अन्दर का उल्लास
हर बार घुमड़ ही जाता है
कुछ अनदेखा, अनचीन्हा

दुनिया की इस भीड़ में
जब उकता कर देखती हूँ
खुद को तो होता है
महसूस कि बदल गया है सब
यहाँ तक कि मेरी उंगलियाँ भी
और इसका स्पर्श भी

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

बिगुल बजाती स्त्री


कोंकणा सेन शर्मा अपने पति को लेकर चिंतित है। वह विदेश में बैठी इंटरनेट के जरिए अपने पति को ढूंढ रही है। वह नहीं मिलता तो मोबाइल कंपनी के जरिए पता लगाती है कि वह भारत के किस कोने में है और उसे ढूंढती वहां आ पहुंचती है। फिल्म "7 खून माफ" में प्रियंका के अभिनय की तारीफ चारों ओर हो रही है, वहीं इस फिल्म में कोंकणा का यह कैमियो महिलाओं की बदलती स्थिति को जाहिर करता है। कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि समाज और महिलाओं की स्थिति उसी तरह बदल रही है, जिस तरह सिनेमा में उनके कैरेक्टर्स। आज से दस साल पहले यह उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी कि वह अपने पति को ढूंढने सात समन्दर पार पहुंच सकती है। कोंकणा ने न अपने किसी रिश्तेदार की मदद ली और न ही घर पर बैठी टेसुए ही बहाती रही। उसने वह उड़ान भरी, जो आज की महिलाओं की बिगुल बजाती आजादी और इंटेलिजेंस का प्रतीक है।

नई स्त्री का जन्म हो चुका है, वह घर पर बैठकर दीन-हीन महसूस करने की बजाय कमर कसकर बाहर निकलती है और अपने हक के लिए लड़ रही है। जिस तरह कोंकणा किसी और र महिला के हाथ में अपने पति को जाता देख साफ शब्दों में कह उठती है- यदि तुमने ऐसा सोचा भी तो मैं तुम्हारा मर्डर कर दूंगी। आज की लड़की बदल गई है, वह न तो रोती है और न ही धोखा बर्दाश्त करती है। न उसे खुद को लेकर कोई गलतफहमी है और न ही वह प्यार के नाम पर खुद को बलिदान करने को तैयार है। यह नई लड़की चारदीवारी में कैद भी नहीं है, अपने रास्ते खुद तलाश रही है। अपनी आजादी के मायने उसने ढूंढ लिये हैं। इसके लिए जरूरी नहीं कि उसे करोड़ रुपये और ऐशो-आराम की जिंदगी ही चाहिए। यह उदय सिर्फ मेट्रो में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी हो चुका है। गांव की स्त्री चूल्हा फूंकते हुए सोचती है कि कब उसकी रसोई में गैस आ पाएगी तो छोटे शहर की लड़की नौकरी करने के सपने दिन-रात देखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि बदलती स्त्री न केवल अपने लिए बदल रही है, बल्कि पूरे समाज में बदलाव देखने को वह छटपटा रही है।

गलतफहमी में रहने की आदत से वह खुद को मुक्ति दिला चुकी है। उसे पता है कि यदि उसने समय पर फलां काम नहीं किया तो देरी हो जाएगी। वह अपनी उम्र अब छिपाती नहीं, अपने सफेद बालों को काले रंग में रंगने को आतुर नहीं रहती। वह ढोल-नगाड़े के साथ सबको बताती है कि वह अब 30 के पायदान पर कदम रख चुकी है। कुछ ऐसा ही हालिया रिलीज फिल्म "टर्निंग 30' में दिखाया गया है। जो 30 पार कर चुकी हैं, उन्हें याद होगा कि जब वे तीस की होने वाली थी, लोगों ने उन्हें बार-बार याद दिलाया होगा कि अब तुम 30 की हो जाओगी, तुम्हें एक बच्चा और पैदा कर लेना चाहिए। छोटे शहरों में अब भी जो तीस की हो रही होंगी और उनकी शादी नहीं हुई होगी, उन्हें सुनाया जाता होगा कि तीस की हो गई और अब तक शादी नहीं हुई। हालांकि मेट्रो में 30 का होना अब कोई बड़ी बात नहीं रह गई है क्योंकि शादी की एवरेज उम्र 28 हो रही है। यह फिल्म नैना सिंह की कहानी है, जो तीस की हो रही है। उसकी मां उसे आए दिन सुनाती रहती है कि तुम तीस की होने आई, तुम्हें शादी करनी चाहिए। दूसरी ओर, नैना हर बार यही जवाब देती है कि तीस की होने का मतलब यह नहीं कि वह किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे से शादी कर लें, बजाए इसके उसे अकेले रहना पसंद है! यही नैना अपने काम का क्रेडिट किसी और के हाथ में जाते देख अपने बॉस को मिडिल फिंगर दिखाने में भी संकोच नहीं करती। मेट्रो में रह रही कई ऐसी लड़कियां हैं, जो आज कुछेक हजार कमाने की बजाए लाखों में कमाती हैं और अपने काम का क्रेडिट किसी और को देने को हरगिज तैयार नहीं हैं, न ही वह दबने को तैयार है। उसे पता है कि समाज को बदलने और खुद की अहमियत पाने के लिए उसे क्या करना है।

वह अब प्यार के चक्कर में नहीं पड़ती और न ही वह प्यार में धोखे खाती है, बल्कि वह प्यार को महसूसना और जीना चाहती है। अपने करियर के रास्ते वह प्यार को नहीं आने देती, बल्कि वह सब करती है जो अब तक पुरुष करते आए हैं। यही वजह है कि मधुर भंडारकर की फिल्म "दिल तो बच्चा है जी' की हीरोइन अपने प्रेमी के पीएफ के रुपये लेकर भाग निकलती है। वह प्यार को आड़े नहीं आने देती, बल्कि उसका लाभ उठाती है। जाहिर है, पुरुषवादी सोच रखने वालों को इस पर आपत्ति होगी और वह इसे गलत भी ठहराएंगे, जबकि सचाई यह है कि अब तक पुरुष जो करते आए हैं, वह अब नई लड़की ने करना शुरू कर दिया है। नई लड़की करियर को इस तरह महत्व देती है कि उसके लिए न केवल विदेश चली जाती है, बल्कि प्यार को भी न्योछावर करने में संकोच नहीं करती। "लव आजकल' की दीपिका का कैरेक्टर ऐसा ही है। वह अपने करियर के लिए बचपन के प्यार को ब्रोक देने में कोताही नहीं करती। नई लड़की को पता है कि उसे किस समय किस चीज की जरूरत ज्यादा है और किस समय उसका कौन सा कदम उसे ऊंचाइयों पर ले जाएगा। पहले की लड़की की तरह वह अपने करियर को सबसे पीछे नहीं रखती, बल्कि सबसे आगे रखती है। मां बन चुकी महिला भी अपने करियर को प्राथमिकता देती है। ऐसा नहीं है कि वह इसके लिए अपने बच्चे को तवज्जो नहीं देती या उसके साथ प्यार के दो पल नहीं बिताती, बल्कि यह कि वह अपने करियर को भी उतना ही महत्व देती है, जितना कि
और चीजों को। यूं तो समाज भी बदल रहा है। तभी तो सर्वे बताता है कि 56 फीसद भारतीय कंपनियां इस साल वर्किंग मॉम्स को नौकरी पर रखने को तैयार हैं। सर्वे में 10,000 बिजनेस रिस्पांडेंट्स ने हिस्सा लिया। यह कंपनियों की उस मानसिकता के परिचय का निचोड़ है, जिसमें पहले मांओं को नौकरी पर रखने से कंपनियां परहेज करती थीं। सर्वे के परिणाम के पीछे के कारण ढूंढे गये तो पता चला कि मां बन चुकी महिलाएं अपने काम के प्रति अधिक कमिटेड होती हैं।

अमिताभ बच्चन की फिल्म - "पा', में अमिताभ के अभिनय की तारीफों के पुल बांधे गए। इसमें उनकी मां का रोल विद्या बालन ने किया था, जो बिन ब्याही मां बनी थी। इस फिल्म में विद्या का कैरेक्टर प्रेगनेंट हो जाने पर न तो अबॉर्शन की सोचता है और न ही अपने प्रेमी से शादी करने के लिए उसके पैरों पर गिर जाता है। उल्टे, वह बड़ी दबंगई से कहती है- "तुमने अपना वीर्य मेरे अंदर डाल दिया, इससे ज्यादा तुमसे और कोई उम्मीद नहीं है।' यह कैरेक्टर आज से पांच साल पहले भी फिल्मों में नहीं था और न ही रीयल जिंदगी में। हां, यह बात अलग है कि करीब 25 साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने बिन ब्याही मां बनना स्वीकार किया और मसाबा को जन्म दिया। भले ही, उस समय नीना को इसके लिए बहुत कुछ सुनना पड़ा हो, लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि दिनोंदिन बढ़ते डिवोर्स, लिव-इन और एलजीबीटी की घटनाएं लड़कियों को इस तरह के कदम उठाने को प्रोत्साहित कर रही हैं। अखबार की एक खबर पर नजर डालें तो हमें पता चलता है कि दो लड़कियां मुंबई से आकर दिल्ली में इसलिए छिपी थीं क्योंकि उन्होंने साथ रहना पसंद किया। वे लेस्बियन हैं और उनका परिवार इसकी इजाजत नहीं देता। फिर भी, हिम्मत करके दोनों ने दिल्ली के एक एनजीओ का दरवाजा खटखटाया आैर शरण मांगी। यह नहीं कि ऐसा करके वे अपने परिवार को मुसीबत में डाल रही हों। उनका परिवार दिक्कत में न पड़े, इसलिए वह लिखकर आती है कि उसके जाने में उसके परिवार की कोई गलती नहीं है, उन्हें परेशानी में न डाला जाए बल्कि इसमें परिवार के लिए उनका प्यार झलकता है। दिक्कत यह है कि उनके इस प्यार को परिवार नहीं समझ रहा, वह तो बस समाज के डर से दबा किसी तरह उसे ले जाना चाह रहा है।


गांवों की स्त्रियां किस कदर बदल रही हैं, इसे नागेश कुकुनूर ने कुछ बरसों पहले रिलीज अपनी फिल्म "डोर' में दिखाया था। गुल पनाग और आएशा टाकिया की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म में शादी के शुरुआती दिनों में ही आएशा टाकिया विधवा हो जाती है। वह इसे अपनी नियति मानकर नहीं बैठ जाती, बल्कि हर उस चीज को इंज्वॉय करना चाहती है, जो उसकी उम्र की अन्य लड़कियां करती हैं। मौका मिलने पर वह इस बंधन से मुक्त पाने को न केवल तैयार होती है, बल्कि निकल पड़ती है। यह स्त्री नई है, जिसके पास विचरने को खुला आकाश है और सींचने को नई जमीन। जो फिल्मकार अब तक रोती-बिसुरती पनाह मांगती औरत को परदे पर बेच रहे थे, उनको अपनी गलती का अहसास होना चाहिए वर्ना वे भी वैसे ही पिछड़ जाएंगे, जैसे और पारंपरिक चीजें।

गुरुवार, जनवरी 20, 2011

नैना को सलाम






वह ठहाके लगाकर हंसती है। मन भर आता है तो टेसुए भी बहाती है। सेक्स को लेकर उसके मन में कोई दुविधा नहीं है। वह अपने तन और मन को अलग करके रखती है। प्यार वह किसी और से करती है लेकिन किसी और से बेड शेयर करने से तनिक भी हिचकिचाती नहीं। किसी भी आम लड़की की तरह वह अपने दोस्तों से कहती है कि मैं उससे मन से शादी कर चुकी हूं। यह नैना सिंह है, जो मुंबई की नामी एडवरटाइजिंग कंपनी में सीनियर पोस्ट पर काम करती है। नैना ऐसी लड़की का पर्याय है, जो अपने काम की प्रशंसा किसी आैर के हाथ में जाने पर अपने बॉस को बीच की उंगली दिखाने से भी हिचकिचाती नहीं। एक सीधी-साधी लाइन में कहा जाए तो नैना सिंह बिंदास है। सही मायने में देखा जाए तो नैना सिंह की कहानी सिर्फ उसकी नहीं है। यह कहानी हर उस लड़की की है, जो इस नये समाज में खुद के लिए संघर्ष कर रही है।
"टर्निंग-30' नामक फिल्म में डेब्यू डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव ने आम शहरी लड़की की कहानी दिखाने की कोशिश की है। लेकिन यह आम लड़की अब की है, इस संदर्भ में देखा जाए तो उसे बिंदास कहा जा सकता है। एक लड़की जब तीस की होने को आती है तो उस पर शादी और बच्चे पैदा करने का प्रेशर किस कदर समाज बनाता है, यह बहुत खूबी के साथ अलंकृता ने दिखाया है। उसके मनोभाव, पसोपेश, प्यार को लेकर खुशी और तनाव को उसने धड़ल्ले से दिखाया है। धड़ल्ले से उसने "किस' भी दिखाया है, जिसे लेकर कुछ लोगों ने बवाल भी मचाया। पर सचाई तो यही है कि हममें से अधिकतर लोग इस "किस' से परे नहीं है। सब अपनी जिंदगी में "किस' करते आए हैं और करते रहेंगे। यह तो हमारे अंदर का दोगलापन ही है कि हम सचाई को खुलेमन से स्वीकार नहीं कर पाते। या करते भी हैं तो उसे दिखाना नहीं चाहते। हमारी आदत ही हो गई है कि हम सब कुछ दबे-ढके ढंग से करने को लाचार हैं। यह लाचारी समाज ने बनाई है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इस लाचारी से नैना सिंह और अलंकृता श्रीवास्तव जैसी लड़कियां निजात पाने की कोशिश में हैं। नैना सिंह के अलावा उसकी दो सहेलियां भी इस लाचारी से निकलने की कोशिश में लगी रहती हैं।
मुझे पता है कि लोग इस सच को स्वीकारना नहीं चाहेंगे लेकिन सचाई यही है कि हमारा शरीर कई दफा रिअक्ट करता है। यही तो नैना के साथ भी हुआ। वह मन के साथ किसी ओर से जुडी रही लेकिन उसके तन ने रिअक्ट किया। "सेक्स', इस शब्द पर आकर हमारा समाज रुक जाता है, छिप जाता है। किसी लड़की ने किस लड़के के साथ बेड पर कैसा समय बिताया, यह वह किसी को बताती नहीं। अपनी सगी सहेली से भी बताने में उसको लाज आती है। लेकिन नैना सिंह के दोस्त बड़ी बेबाकी से उससे पूछ डालते हैं कि दो सेक्स पार्टनर में से उसे किसने बेड पर ज्यादा लुभाया। इतनी ही बेबाकी से नैना जवाब भी देती है। आश्चर्य तो यह भी है कि इसी समय उसका एक पार्टनर (जिसकी तारीफ वह करती है) मौजूद है। वह किसी भी आम लड़के की तरह नैना पर झुंझलाता नहीं, बल्कि मुस्कुराता है।
मेरा यहां इस संदर्भ को पेश करने का तात्पर्य बिल्कुल भी यह नहीं है कि लड़कियों को अपना सेक्स पार्टनर बदलना चाहिए। मैं इसकी पक्षधर हो भी नहीं सकती, क्योंकि यह सबका निजी मामला है। किसी को कितने पार्टनर बनाने हैं और कितने नहीं, यह उसका बेहद निजी मामला है। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि नैना और उसे दोस्त खुले दिमाग के हैं। उनकी सोच बेड़ियों में जकड़ी हुई नहीं है। वह आज के युवा हैं, जो खुली सोच रखते हैं। क्योंकि खुली सोच रखने वाले यही युवा प्यार को लेकर उतने ही संजीदा भी हैं। यही वजह है कि नैना के बर्थडे पर ही उसकी नजदीकी सहेली जगजाहिर करती है कि वह बाइसेक्सुअल है। पहले तो सब इसे मजाक समझते हैं लेकिन फिर सभी इस सच को बड़ी आसानी से पचा लेते हैं। उसकी सहेली बड़े प्यार से अपनी पार्टनर को लेकर सारी गैदरिंग में आती है और सब उन्हें बतौर पार्टनर स्वीकार भी कर लेते हैं।
इसी फिल्म में नैना की एक और सहेली है, जो शादीशुदा है। उसका तर्क यह है कि उसने सही उम्र में शादी करके घर बसा लिया है। उसे बेहद प्यार करने वाला पति भी मिला है। इसे धक्का तब लगता है जब पता चलता है कि उसके पति का अफेयर किसी और से है। वह इसे पचा पाने की स्थिति में तब आती है, जब वह प्रगेनेंट हो जाती है। सब कुछ बदल जाता है, पति उस लड़की से ब्रोकअप कर लेता है। बेबी डिलीवर होने के बाद पति फिर से लड़कियों के चक्कर में फंस जाता है। लेकिन इस बार वह दुखी नहीं होती। बच्चे में ही अपना भविष्य देखती है और कहती है कि मेरे बच्चे को पापा की जरूरत है। यह लड़की असल मायने में आज के समाज का प्रतिनिधित्व कर रही है। हमारे यहां की अधिकतर औरतें ऐसी ही झूठी जिंदगी जीती हैं। पति है प्यार करने वाला, तब तक, जब तक वह घर में है। घर से बाहर निकलते ही वह कुछ और हो जाता है। वह किसी और को चाहता है, किसी और से अपना बेड भी शेयर करता है। लेकिन कहलाता है "गुड एंड परफेक्ट हसबैंड'।
इन औरतों की जिंदगी से कहीं बेहतर जिंदगी नैना की है। वह रोती है, चिल्लाती है। अपने प्यार को वापस पाने के लिए जुनूनी है। इसी जुनून में वह अपने "सो कॉल्ड लवर' को पाने के लिए सेक्स का इस्तेमाल बतौर हथियार करती है। एकबारगी तो यह देखने और सुनने में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता लेकिन वास्तविकता के धरातल पर किसी लड़की के मन में झांकें तो पता चलता है कि वह अपने प्यार को किसी भी बलबूते पाना चाहती है। वह प्यार, जिसने उसे घर-गृहस्थी बसाने का सपना दिखाया। वह साथ, जो पूरी रात उसके साथ रहता था। वह साथ, जो अपने पैरेंट्स से उसे नियमित तौर पर मिलवाता रहता था।
यही नैना ब्रेकअप के बाद पूरी तरह से टूट जाती है। इस दौरान उसकी जिंदगी में वापस आता है वह लड़का, जो उसे एक बार धोखा दे चुका है। लेकिन इस बार वह उसके साथ घर बसाने की इच्छा लेकर आया है। नैना उससे मानसिक तौर पर तो बिल्कुल भी नहीं जुड़ पाती लेकिन शाररिक तौर पर जुड़ जाती है। जब जय उसे कहता है कि वह अब और उसके लिए "ब्रोकअप सेक्स ट्वॉय' बनकर नहीं रह सकता तो नैना कुछ समझ नहीं पाती। बल्कि वह उससे लड़ती है और कहती है जब उसका मन करेगा, वह उसे छोड़ जाएगा, जब मन करेगा लौट आएगा। इस बार उसकी यह टूटन दूसरे अंदाज में सामने आती है। वह लड़ती है खुद से। पूरी-पूरी रात टेरेस पर बिता देती है। दिन से रात और रात से दिन कैसे बीता, उसे याद नहीं रहता। फिर नई सुबह आती है नया अलग जगाते हुए।
नैना की डायरी उपन्यास के कलेवर में छपता है। वह अपने पुराने ऑफिस के खिलाफ केस लड़ती है और जीत जाती है। पुराना प्रेमी वापस आता है लेकिन वह उसे स्वीकारती नहीं। वह पहले प्रेमी "जय' को स्वीकारती है लेकिन अपनी शर्तों पर। रात चाहे जितनी भी लंबी क्यों न हो, सवेरा तो सबकी आंखों को खोलता है। चिड़ियों की चहचहाहट और सूरज की किरणें नई शुरुआत करती हैं। नैना की शुरुआत भी ऐसी ही रही। ऐसी लड़की की शुरुआत, जिसने अपनी शर्तों पर जीवन जिया। जिसने अपने तन और मन के बीच दीवार खड़ी कर दी। नैना हर उस लड़की कहानी है, जो सबके अंदर बसती है। बस जरूरत है उसे ढूंढने की, उसकी हिम्मत को अपने अंदर ले आने की। उसके जज्बे को सलाम करने की। यह कहानी 30 की हो चुकी सिर्फ एक लड़की की नहीं, बल्कि हर उस लड़की की है जो अकेले अपने दम पर जीने का दुस्साहस रखती है।

मंगलवार, जनवरी 11, 2011

सब एकरस



















प्यार कुछ नहीं होता
सिवा एक एहसास के
एक सांस के
एक प्यास के


प्यार अवैध नहीं होता
ना ही वैध होता
सदैव है होता
देव है होता

प्यार में समर्पण
है बस इसमें जीवन
नहीं है इसमें रावण
सौभाग्य जैसा सुवर्ण

प्यार ना देह
ना विदेह
प्यार ना छूवन
ना बेछूवन

प्यार में सब एकरस
क्या आत्मा
क्या परमात्मा
क्या स्पर्श
क्या संघर्ष

गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

सिंदूरी आभा






























टूटन क्या होता है...
मैं जानती हूँ...
तुम जानते हो शायद...
अब ये टूटन न हो..
अब ये बिखराव न हो...
बस यही कामना...
यही चाहत...
और कुछ नहीं...
तुम मुझे चाहो...
मैं तुम्हे चाहूँ...
जीवन यही तो है...
मंगलमय और सुंदर....
थोड़ी नोक झोक....
थोड़ी मनुहार...
थोड़ा दुलार...
मुझे मेरे पति का, जो तुम हो...
तुम्हे तुम्हारी पत्नी का, जो मैं हूँ...
सिंदूरी आभा सा प्यार...
दूर तक गहराता...

मंगलवार, नवंबर 30, 2010

कहानी रेत की

जाते समय तुम मेरी हंसी ले गए
मेरी मुस्कान भी चली गयी
अब तो इन्तेहा हो गयी
प्यार जैसे मर गया
रेत हो गयी मैं
भरभराती फिसलती
बिखरती उड़ती
धूसरित होती
रेत भी भला
क्या कभी हंसती है
स्वीकार लेती है बस उड़ना
बिखरना फिसलना

शुक्रवार, अक्टूबर 22, 2010

अंडरगारमेंट्स!


अब अंडरगारमेंट्स छिपाने की चीज नहीं, बल्कि बताने की चीज है। आपने कौन सा रंग पहना है, उस रंग का क्या महत्व है, यह सब अब लड़कियां धड़ल्ले से जाहिर कर रही हैं। ए क नए सर्वेक्षण के अनुसार, अंडरगारमेंट्स का कलर राज खोलता है कि आप किस तरह की प्रेमिका हैं। इससे यह पता चलता है कि लड़कियां अब सकुचाती नहीं, बल्कि बोल्ड हो रही हैं। अंडरगारमेंट्स किस तरह लड़कियों को आ॓पन कर रहा है, जानिए स्पर्धा की रिपोर्ट से-
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके द्वारा पहने जाने वाले अंडरगारमेंट्स आपके प्यार का पैरोमीटर हो सकते हैं यदि नहीं सोचा है तो जान लीजिए कि इसमें काफी हद तक सचाई है। लड़कियों द्वारा पहने जाने वाले अंडरगारमेंट्स के रंग बताते हैं कि आप किस तरह की प्रेमिका हैं, ए ेसा कहना हमारा नहीं, बल्कि ब्रिटिश साइकोलॉजिस्ट डोना डॉसन का है। रेड कलर के अंडरगारमेंट्स पसंद करने वाली लड़कियां प्यार में शर्मीली नहीं होतीं, तो यदि आपकी पसंद पिंक कलर की इनरवियर है तो आप कभी भी प्यार में पहल नहीं करेंगी। सदाबहार कलर व्हाइट को पसंद करने वाली लड़कियां हमेशा सीखने को उत्सुक रहती हैं।


यह कोई कोरी बकवास नहीं, या केवल ए क साइकोलॉजिस्ट का कहना नहीं है, बल्कि ए क सर्वेक्षण प्यार और अंडरगारमेंट्स के बीच के इस अजब-गजब रिश्ते का खुलासा करता है। सर्वेक्षण में पाया गया कि 7२ फीसद महिलाए ं क्लासिक व्हाइट, ब्लैक या ैंसी लेस वाले अंडरगारमेंट्स की बजाय न्यूड या स्किन कलर की अंडरगारमेंट्स खरीदना पसंद करती हैं। यही वजह है कि हर साल न्यूड कलर के अंडरगारमेंट्स में 38 फीसद की बढोत्तरी होती रहती है। ए ेसा अंडरगारमेंट्स की ंपनी डेबेनहैम्स का कहना है। ए ेसा नहीं है कि यह र्सि सर्वेक्षण की ही बात है। इसका पुक्ष्ता प्रमाण हॉलीवुड सेलिब्रिटी इवा मेंड्स की बातों में मिलता है। इवा ने हाल ही में अपने अंडरगारमेंट्स की पसंद को लेकर खुलासा किया था कि वह न्यूड या बेसिक अंडरवियर में खुद को सबसे ज्यदाा सेक्सी महसूस करती हैं। यही नहीं, पॉप स्टारलेट केटी पेरी ने भी नामी पत्रिका रोलिंग स्टोन की कवर गर्ल बनने के लिए सेक्सी लेस वियर की बजाय सिंपल न्यूड ब्रा और और पैंटी को पसंद किया। न्यूड अंडरगारमेंट्स का मतलब यह है कि किसी से कुछ छिपाना नहीं यानी सब कुछ दिखा देना। वैसे भी जमाना खुलेपन का है। न्यूड कलर की ब्रा नैचुरल, ईजी-गोइंग, डाउन टू अर्थ और ट्रांसपेरेंसी की प्रतीक है। इस रंग की ब्रा पहनने वाली महिला रिलैक्स रहती है, उसके पास छिपाने को कुछ नहीं होता। वहीं दूसरी आ॓र, रेड, यलो, ऑरेंज जैसे रंग उत्साह का अहसास जगाते हैं। हमारे ब्लड प्रेशर को बढ़ाते हैं, दिल की धड़कन तेज कर देते हैं और सांसों की आवाजाही भी तेज हो जाती है।


इस सर्वेक्षण के बाद डोना डॉसन ने ने हर कलर की ब्रा का मतलब निकाला है। रेड कलर की ब्रा जहां पैशनेट, ए नर्जेटिक, ड्रामैटिक होने का प्रतीक है तो ब्लैक ब्रा पावरफुल, इंडिविजुअलस्टिक और सल्ट्री होने की। व्हाइट ब्रा भोलापन लेकिन सलाह के लिए तैयार महिला काप ्रतीक है तो पिंक ब्रा रोमांटिक और सेंसुअस लड़की का प्रतीक है। यही वजह है कि पिंक ची अभियान वैलेंटाइन डे पर शिव सेना वालों को मजा चखाने के लिए शुरू किया गया था, क्योंकि पिंक कलर रोमांस का प्रतीक है। इस ैम्पेन को कई लोगों ने ज्वाइन कर लिया था। करीब डेढ़ हजार पिंक कलर की पैंटीज शिव सेना वालों को भेजी गई थी। ए डमैन प्रहलाद कड़ को यह आइडिया काफी बढ़िया और मजेदार लगता है। उनके अनुसार, ड्रिंक पीने वाली लड़कियों को पीटने पर विश्वास करने वालों को पिंक कलर की पैंटी भेजना थोड़ा हैरान करने वाला है। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस ैम्पेन ने इस तरह की गतिविधियों की नई शुरूआत कर दी है।


ए ेसा नहीं है कि अंडरगारमेंट्स को लेकर कुछ नया अभी ही किया गया है। कम ही लोगों को पता होगा कि इस तरह की गतिविधि पिंक चढडी अभियान से पहले ही म्यामां में की गई थी। अक्टबूर 2व्07 में म्यामां के महिला संगठन लान्ना ए क्शन फॉर बर्मा ने शांति प्रस्तावना के मद्देनजर पैंटी की पेशकश की थी। उनका लक्ष्य पैंटी के जरिए मिलट्रिी द्वारा म्यामां की जनसंक्ष्या विशेषकर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकना था। इस ैम्पेन को म्यामां सहित ऑस्ट्रेलिया, फिलिपीन्स, जर्मनी, स्पेन, स्वीडन, स्विटजरलैंड, पोलैंड, अमेरिका और ब्राजील में लांच किया गया। इन देशों की महिलाओं से कहा गया कि वे अपनी पैंटी म्यामां के स्थानीय दूतावास भेजें। दरअसल म्यामां में यह अंधविश्वास है कि महिलाओं के अंडरपैंट के संर्प में आने से शक्ति क्षीण हो जाती है। अब वह दिन नहीं रहा जब अपने अंडरगारमेंट्स के बारे में बताने से महिलाए ं सकुचाती थी। अंडरवियर इम्पावरमेंट ने विश्व में नई लहर पैदा कर दी है। ए ेसे में अंडरगारमेंट्स के रंगों को लेकर किया गया यह ताजा सर्वेक्षण लड़कियों के हौसले और बुलंद कर रहा है।


पिछले दिनों ब्रा को लेकर ए क नया ैम्पेन अपने देश में और देखने को मिला। ब्रेस्ट ैंसर को सपोर्ट करने के लिए लड़कियों को कहा गया कि वे जिस रंग की ब्रा पहनती हैं, वह रंग अपने स्टेटस मैसेज में लिखें। आश्चर्यजनक तो यह रहा कि सभी ने इसमें उत्साहित होकर भाग लिया और अपनी ब्रा का कलर स्टेटस मैसेज में लिखा भी। कोई भी यह रंग बताने में सकुचाया नहीं, बल्कि कुछ लड़कों ने भी इस ैम्पेन में जमकर भाग लिया। इसे ब्रा कलर ैम्पेन का नाम दिया गया। कॉज्ञेडियन वीर दास इस ंडे को अच्छा मानते हुए कहते हैं कि काश मैं भी ब्रा पहनता तो अपनी ब्रा का रंग जरूर सबको बताता। पर अफसोस मैं लड़का हूं, लड़की नहीं। ए क्सपोर्ट हाउस में काम करने वाली नेहा शर्मा कहती हैं, ’मुझे इस तरह की ए क्टिविटी अच्छी लगती है। खुशी तो इस बात की भी है कि अब लड़कियां किसी भी चीज को लेकर चुप नहीं हैं, वे खुल रही हैं। उन्हें अपनी स्वतंत्रता का अहसास है।’


अंतर्मन का दर्पण

अंडरगारमेंट्स के कलर को लेकर हुआ यह सर्वेक्षण हो या रंगों को लेकर हुआ कोई और सर्वेक्षण, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हम जो भी पहनते हैं या हमारी जीवनशैली जैसी होती है, उससे हमारे अंतर्मन और हमारी चाहतों का पता चलता है। भड़कीले रंग वाले पोशाक पहनने वाले दूसरों का ध्यान अपनी आ॓र आकर्षित करना चाहते हैं। यह सब आपके अंदर की दशा को दर्शाता है। कई लोग टैटू बनवाते हैं, कुछ तो अपने प्राइवेट पार्ट्स पर भी टैटू बनवाने लगे हैं, यह सब उस व्यक्ति के अंदर के द्वंद्व को दर्शाता है, उसकी चाहतों को बताता है। इसी तरह अंडरगारमेंट्स को लेकर देश-दुनिया में चल रही गतिविधियों के लिए यह कहा जा सकता है कि इससे लोग दूसरों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। सभी जानते हैं कि अंडरगारमेंट्स ए ेसी चीज है, जो सहज ही दूसरों को आकर्षित करती है।

-डॉ समीर पारिख वरिष्ठ मनोचिकित्सक फोर्टिस अस्पताल


मेल ब्रा

पुरूषों के लिए ब्रा! यह सुनने में भले ही बेहद अजीब लग रहा हो, पर सच तो यही है कि जापान के बाजार में इन दिनों मेल ब्रा की धूम मची है। इसे ईजाद किया है अंडरवियर मेकर मसायुकी सुचिया ने। मसायुकी ने मेल ब्रा को लेकर सात सालों तक लगातार सोचा और फिर इसे लांच किया। मसायुकी कहते हैं कि मुझे समझ में नहीं आता था कि मेल ब्रा आखिर पुरूषों की किस जरूरत को पूरा करेगा। पिछले साल उन्हें अपने इस सवाल का जवाब मिला। उनकी टोक्यो स्थित ंपनी विशरूम में कुछ ग्राहकों ने फोन करके उन्हें बताया कि ब्रा पहनने से उनके मसल्स न बड़े दिखते हैं और ना ही उनकी पोश्चर सही होती है। बल्कि ब्रा पहनने से वे कहीं ज्यादा रिलैक्स महसूस करते हैं। पुरूषों के पक्ष से देखा जाए तो यह साइकोलॉजिकल ही है। फिर मसायुकी ने 8व् सेमी, 8५ सेमी और 9व् सेमी में ए -कप ब्रा ऑर्डर किए । अपनी ंपनी के ऑनलाइन शॉपिंग मॉल राकुटेन में उन ब्रा को डालने के तुरंत बाद सभी बिक गए । ए क महीने के अंदर ही टीवी कार्यक्रमों और न्यूजपेपर में दिखाए जाने लगे। हालत यह है कि अब प्रति माह 1व्0व् मेल ब्रा बनाए जा रहे हैं। मसायुकी का कहना है कि जापानी पुरूषों को काफी तनाव होता है और ब्रा इस तनाव से उन्हें मुक्ति दिलाते हैं। मसायुकी द्वारा तैयार किए गए मेल ब्रा के खरीदारों की उम्र 3व्-4व् वर्ष है। मसायुकी के अनुसार, ए क ग्राहक ने बताया कि इस ब्रा को पहनने के बाद वह अपनी फीलिंग्स को ’रीसेट‘ कर पाता है। यदि कुछ बुरा होता है तो वह ब्रा पहन लेता है और उसे लगता है कि वह अगले दिन लड़ने को तैयार है। मसायुकी को उम्तर के 5व्वें और 6व्वें पायदान के लोगों की आ॓र से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं। यही नहीं, विदेशों से खासकर अमेरिका से भी लोग जानकारी के लिए मसायुकी से बात कर रहे हैं।