शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

मैं खुश हूँ...



खुशनुमा एहसास
खुशनुमा प्यार
अजनबी सा बिलकुल नहीं
मेरा अपना संजोया संव्राया

भले ही छूट गए तुम
सशरीर
लेकिन आत्मा मेरी
तुम्हारे साथ रही

वही तुम्हारे अन्दर
तुम्हारे मन में बसी बसाई
अब जब तुम हो सशरीर भी
तो मेरे कण कण में तुम
मेरी उँगलियों में
मेरे होठों पर
मेरे गालों पर
दौड़ती तुम्हारी भाषा
तुम्हारी छूवन
तुम्हारे बोल
तुम्हारा स्पर्श...

सोमवार, जून 14, 2010

पा लिया
























जी भर कर जब देखा तुम्हे
तुम वही लगे
कुछ मेरे अपने कुछ पराये
कुछ जाने कुछ अनजाने
कुछ सोचे कुछ समझे
कुछ प्यारे कुछ पुकारे

अब जब तुम नहीं हो
मेरे सामने न होते हुए भी मेरे हो
एकदम अपने
मानो मेरे अन्दर बसे
कुछ उलझे कुछ उलझाते
कुछ सुलझे कुछ सुलझाते

आज भी तुम उतने ही करीबी हो
मेरे अन्दर सांस लेते
मेरी आँखों में बसे
मेरे होठों पर मुस्काते
मेरे स्पर्श में बसे

मेरी हर धड़कन में बसे
मेरी हर सांस में समाये
हाँ तुम ही वो
जिसे मैंने ढूंढा
आखिरकार पा भी लिया



शनिवार, जून 12, 2010

प्यार क्या है


प्यार क्या है? मैंने खुद से यह सवाल कई बार पूछा है. मन में कई जवाब आते भी हैं. कभी लगा प्यार पाना है तो कभी लगा की प्यार देना है. कभी लगा की प्यार छोड़ देना है. आपका होगा तो वापस आयेगा जरुर. आता भी है. लेकिन फिर चला जाता है. इस प्यार को क्या कहेंगे? ये कैसा प्यार है जो आता है और फिर चला जाता है? कहते हैं फुल की खुशबु की तरह प्यार होता है. तो कुछ लोग कहते हैं की प्यार जादुई होता है. पर मैंने जिस प्यार को महसूस किया है, वो अजीबोगरीब किस्म का है. मन में बेचैनी जगा जाता है और फिर छोड़ जाता है अकेले सुबकने के लिए. तब मन में आता है की इस प्यार को क्या कहें, क्या नाम दे? जो आपको छोड़ जाता है सुबकने के लिए, लड़ने के लिए.
प्यार, ये हमे जीना भी सिखाता है आपके अपनों के लिए. उन्हें खुश देखने के लिए, उन्हें प्यार करने के लिए. मैंने शिद्दती प्यार को महसूस किया है, जो आता है दुबारा तो फिर जाने का नाम नहीं लेता. नश्तर की तरह चुभ जाता है आपके अन्दर. तीस्त्ता रहता है पल-पल हर क्षण. कष्ट देता है और ख़ुशी भी. सोचने पर महसूस होता है की प्यार कितना खुबसूरत होता है. तो कभी लगता है प्यार कितना कष्टदायक होता है. पर प्यार तो वही है तो जो आपको हिम्मत दे, जूनून दे. कुछ पाने का जूनून, किसी को चाहने का जूनून. और वो प्यार ही किस काम का जो आपमें जूनून न पैदा करे. जो आपको लड़ने पर उतारू न कर दे, अपनी किस्मत से, अपनी परिस्थितियों से. प्यार तो उस रस्ते की तरह है जिस पर आप चलते हैं तो उस छोटे गड्ढे को नहीं याद रखते जो रस्ते में आता है. बल्कि पुरे रास्ते को याद करते हैं और खुश होते हैं की ये रास्ता बहुत प्यारा है, आखिर आपकी जिंदगी का प्यार जो साथ है.

शुक्रवार, जून 11, 2010

घाव मेरे भी हैं


तुम वो नहीं जिसे मैंने चाहा था
तुम वो नहीं जिसे मैंने पूजा था
मैं तो कभी निकल ही नहीं पायी
उन लम्हों से
उन बातों से
अन्दर तक कही गहरे
घाव मेरे भी हैं
नहीं दिखाया तुम्हे
उम्मीद थी के घाव भर जायेंगे
अब जब उम्मीद की
तुमने मेरे घाव हरे कर दिए
तोड़ डाला मुझे
एक बार फिर
दुबारा
और कहते हो
हिम्मत नहीं है
अरे तुम सच में हो कायर
तुम्हारे अपने तुम्हारे नहीं
वो जब कल होंगे व्यस्त
तब तुम क्या करोगे
उनके बच्चो की नेप्पी साफ़ करोगे
कहते फिरोगे मैंने तो कईयों को जिलाया है
अपना घर होम कर

शुक्रवार, जून 04, 2010

मैं ही हू...



























ज़ी हा...
फिर से मैं ही हू...
आती जाती...
गुनगुनाती...
इठलाती...
रोती गाती हंसती और हंसाती...
वो दिन जो थे मेरे...
जो थे हमारे...
कही हैं अब भी
मेरे अन्दर दहकते...
दह्काते मचलते...

सोमवार, मई 24, 2010

मेरी हिता....


मेरी सहेली गीता ने ये कविता बड़े प्यार से लिखी है...



कूदती फांदती,

नाक बहती

दांत खुजाती

कब गोद में आओगी...........

गुन गुने हाथों से

मेरे दूध को बोलो कब तुम सह्लओगी.......

पैर कब लगेंगे,

कब हाथ होंगे बड़े,

और तब तुम आकर

मेरे आँचल में छिप जाना

हम तुम मिलकर

तब लुका छिपी खेलेंगे.....

लव, धोखा और धोखेबाज


लिव-इन रिलेशन को लेकर कोर्ट ने छूट दे दी है। उन थकाऊ और उबाऊ लोगों के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया है, जो इसके खिलाफ बोलते रहे हैं। निश्चित तौर पर कोर्ट का यह फैसला पुरातनपंथी सोच वालों के गले नहीं उतर रहा। लिव-इन का पुरजोर समर्थन करने वाले खुश हैं लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चाहे लिव-इन हो या कोई अन्य रिश्ता, तमाम रिश्तों में धोखा देना आम बात हो गई है। अभी एक सप्ताह पहले ही खबर आई थी कि किस तरह ग्रेटर नोएडा में लिव-इन में रह रहे लड़के ने लड़की को धोखा दे दिया। मामला पुलिस थाने तक जा पहुंचा। यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी रिश्ते में धोखा हुआ करते थे। अब भी होते हैं। बस अंतर यह है कि अब सामने आने लगे हैं। लोगों में हिम्मत बढ़ गई है।

लिव-इन का जोर इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। दिल्ली में रहने वाली रोमा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे एक दिन प्रशांत का साथ छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। रोमा ने प्रशांत की हरसंभव देखभाल की। उसकी नौकरी न रहने पर उसका फोन बिल जमा कराने से लेकर उसके तनाव को झेला भी लेकिन रोमा को अंतत: कुछ हासिल नहीं हुआ। एक दिन प्रशांत ने कह दिया कि अब वह उसके साथ रिश्ता नहीं रखना चाहता। उसने कभी भी रोमा को चाहा ही नहीं। रोमा के पास सिवाए रोने के कोई और चारा ही नहीं था। लाख पूछने पर प्रशांत ने केवल यह बताया कि वह उसके टाइप की नहीं है। यह केवल रोमा और प्रशांत की कहानी नहीं है। धोखाधड़ी केवल लिव-इन या वैवाहिक रिश्ते में ही नहीं होती। भाई-बहन, दोस्त, मां-बच्चे के रिश्ते में भी धोखाधड़ी की पूरी आशंका रहती है। धोखा केवल स्त्री ही नहीं, पुरुषों को भी मिलता है। और धोखा केवल पुरुष ही नहीं, स्त्री भी देती है। बस अंतर यह होता है कि लड़कियां बेहद इमोशनल होती हैं, वे दिल से ज्यादा और दिमाग से कम सोचती हैं। उन पर समाज का इतना अधिक दबाव होता है कि इस बारे में सोचकर भी कुछ कर नहीं पातीं। दिमाग में कुछ आया नहीं कि उन विचारों को झटकने में लग जाती हैं।

तमाम आंकड़े और शोध भी बताते हैं कि लड़कियां दिमाग से कम और दिल से ज्यादा सोचती हैं। औसत तौर पर देखा जाए तो करीब 87 फीसद महिलाएं स्वीकारती हैं कि वे चाहकर भी अपने रिश्ते को छोड़ नहीं पातीं। धोखाधड़ी और चोरी के मामले में चाहे धोखा स्त्री ने दिया हो या पुरुष ने, धोखे का खामियाजा केवल स्त्री को ही उठाना पड़ता है। वह न केवल इमोशनल तौर पर टूटती-बिखरती है, बल्कि सामाजिक दायरे में भी उसे ही सब बर्दाश्त करना पड़ता है। यदि पुरुष ने उसे धोखा दिया है तो उसके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। उसे महसूस होता है कि वह जहां भी जाएगी, सब उससे उस पुरुष के बारे में पूछेंगे, जिसने उसे छोड़ दिया है। यदि उसने धोखा दिया है तो भी उसी से ऐसे सवाल किए जाएंगे। उससे पूछा जाएगा कि आखिर उस पुरुष में क्या कमी थी जो उसने उसे छोड़ने की हिम्मत दिखाई। दोनों स्थितियों में लोग-समाज उसे ही दोष देंगे। तरह-तरह की उपाधियों से नवाजेंगे।
हाँ , यह जरूर है कि इन दिनों युवाओं के विचार में धोखा देने, लेने और महसूस करने के मायने जरूर बदल गए हैं। नई जेनरेशन के लिए धोखा करने का मतलब कोई बड़ा तूफान नहीं होता। जहां भी आप अपने को, अपनी भावनाओं को ठगा हुआ पाते हैं, वहीं आहट महसूस करते हैं। आप जिसके साथ रूम मेट के तौर पर रहते हैं, वहां भी धोखा चुभता है। फिर रिश्ते तो मन से जुड़े होते हैं। गहरे संबंध हों चाहे मामूली सा सहकर्मी, जब जुड़ाव होने लगता है तो तब ईमानदारी की उम्मीद भी होती है। यकीन जरा सा भी टूटे तो किरच चुभती ही है। कभी तो संभल जाते हैं। कभी घाव गहरे हो जाते हैं। देखा जाए तो धोखाधड़ी स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसकी कोई सटीक परिभाषा नहीं है और न ही खांचा। यह कभी भी किसी के मन में आ सकता है। सही तरह से समझने की कोशिश की जाए तो यह काफी हद तक व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है। कई बार तो रिश्ते में स्पेस न मिलने की वजह से भी मन भागने लगता है। हर समय सवालों का जो फंदा सामने रहता है, उससे मन ऊब की ओर बढ़ता है। कई बार तो सामने वाले की अपेक्षाओं पर आप लगातार नहीं उतर पाते हैं तो भी रिश्ता टूटन की ओर बढ़ने लगता है। इसलिए बेहतर तो यह है कि आप अपने रिश्ते में रोमांच को बनाए रखें।

अब रश्मि और दीप्ति की दोस्ती को ही लें। दोनों एक-दूसरे के साथ करीब आठ साल से हैं। दोनों पक्के दोस्त हैं, बल्कि परिवार कहना ज्यादा बेहतर होगा। दीप्ति की जिंदगी में किसी का आगमन हुआ। जाहिर सी बात है दोनों का मिलना थोड़ा कम हो गया। रश्मि आठ साल की अपनी दोस्ती को यूं थोड़ा भी अलग होता नहीं देख पाई। वह बार-बार दीप्ति को फोन मिलाती और पूछती रहती कि वह कहां है। स्पेस न मिलने से दीप्ति का नाराज होना स्वाभाविक था। फलत: दीप्ति रश्मि से दूर होने लगी। यह स्पेस किसी भी रिश्ते को बनाए रखने, जोड़े रखने के लिए बेहद जरूरी होता है। रिश्ते में धोखा न हो, इसलिए बातचीत की पूरी आजादी होनी चाहिए। क्योंकि कहते हैं न कि बात करने से ही बात शुरू होती है।