
लिव-इन रिलेशन को लेकर कोर्ट ने छूट दे दी है। उन थकाऊ और उबाऊ लोगों के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया है, जो इसके खिलाफ बोलते रहे हैं। निश्चित तौर पर कोर्ट का यह फैसला पुरातनपंथी सोच वालों के गले नहीं उतर रहा। लिव-इन का पुरजोर समर्थन करने वाले खुश हैं लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चाहे लिव-इन हो या कोई अन्य रिश्ता, तमाम रिश्तों में धोखा देना आम बात हो गई है। अभी एक सप्ताह पहले ही खबर आई थी कि किस तरह ग्रेटर नोएडा में लिव-इन में रह रहे लड़के ने लड़की को धोखा दे दिया। मामला पुलिस थाने तक जा पहुंचा। यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी रिश्ते में धोखा हुआ करते थे। अब भी होते हैं। बस अंतर यह है कि अब सामने आने लगे हैं। लोगों में हिम्मत बढ़ गई है।
लिव-इन का जोर इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। दिल्ली में रहने वाली रोमा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे एक दिन प्रशांत का साथ छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। रोमा ने प्रशांत की हरसंभव देखभाल की। उसकी नौकरी न रहने पर उसका फोन बिल जमा कराने से लेकर उसके तनाव को झेला भी लेकिन रोमा को अंतत: कुछ हासिल नहीं हुआ। एक दिन प्रशांत ने कह दिया कि अब वह उसके साथ रिश्ता नहीं रखना चाहता। उसने कभी भी रोमा को चाहा ही नहीं। रोमा के पास सिवाए रोने के कोई और चारा ही नहीं था। लाख पूछने पर प्रशांत ने केवल यह बताया कि वह उसके टाइप की नहीं है। यह केवल रोमा और प्रशांत की कहानी नहीं है। धोखाधड़ी केवल लिव-इन या वैवाहिक रिश्ते में ही नहीं होती। भाई-बहन, दोस्त, मां-बच्चे के रिश्ते में भी धोखाधड़ी की पूरी आशंका रहती है। धोखा केवल स्त्री ही नहीं, पुरुषों को भी मिलता है। और धोखा केवल पुरुष ही नहीं, स्त्री भी देती है। बस अंतर यह होता है कि लड़कियां बेहद इमोशनल होती हैं, वे दिल से ज्यादा और दिमाग से कम सोचती हैं। उन पर समाज का इतना अधिक दबाव होता है कि इस बारे में सोचकर भी कुछ कर नहीं पातीं। दिमाग में कुछ आया नहीं कि उन विचारों को झटकने में लग जाती हैं।
तमाम आंकड़े और शोध भी बताते हैं कि लड़कियां दिमाग से कम और दिल से ज्यादा सोचती हैं। औसत तौर पर देखा जाए तो करीब 87 फीसद महिलाएं स्वीकारती हैं कि वे चाहकर भी अपने रिश्ते को छोड़ नहीं पातीं। धोखाधड़ी और चोरी के मामले में चाहे धोखा स्त्री ने दिया हो या पुरुष ने, धोखे का खामियाजा केवल स्त्री को ही उठाना पड़ता है। वह न केवल इमोशनल तौर पर टूटती-बिखरती है, बल्कि सामाजिक दायरे में भी उसे ही सब बर्दाश्त करना पड़ता है। यदि पुरुष ने उसे धोखा दिया है तो उसके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। उसे महसूस होता है कि वह जहां भी जाएगी, सब उससे उस पुरुष के बारे में पूछेंगे, जिसने उसे छोड़ दिया है। यदि उसने धोखा दिया है तो भी उसी से ऐसे सवाल किए जाएंगे। उससे पूछा जाएगा कि आखिर उस पुरुष में क्या कमी थी जो उसने उसे छोड़ने की हिम्मत दिखाई। दोनों स्थितियों में लोग-समाज उसे ही दोष देंगे। तरह-तरह की उपाधियों से नवाजेंगे।
हाँ , यह जरूर है कि इन दिनों युवाओं के विचार में धोखा देने, लेने और महसूस करने के मायने जरूर बदल गए हैं। नई जेनरेशन के लिए धोखा करने का मतलब कोई बड़ा तूफान नहीं होता। जहां भी आप अपने को, अपनी भावनाओं को ठगा हुआ पाते हैं, वहीं आहट महसूस करते हैं। आप जिसके साथ रूम मेट के तौर पर रहते हैं, वहां भी धोखा चुभता है। फिर रिश्ते तो मन से जुड़े होते हैं। गहरे संबंध हों चाहे मामूली सा सहकर्मी, जब जुड़ाव होने लगता है तो तब ईमानदारी की उम्मीद भी होती है। यकीन जरा सा भी टूटे तो किरच चुभती ही है। कभी तो संभल जाते हैं। कभी घाव गहरे हो जाते हैं। देखा जाए तो धोखाधड़ी स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसकी कोई सटीक परिभाषा नहीं है और न ही खांचा। यह कभी भी किसी के मन में आ सकता है। सही तरह से समझने की कोशिश की जाए तो यह काफी हद तक व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है। कई बार तो रिश्ते में स्पेस न मिलने की वजह से भी मन भागने लगता है। हर समय सवालों का जो फंदा सामने रहता है, उससे मन ऊब की ओर बढ़ता है। कई बार तो सामने वाले की अपेक्षाओं पर आप लगातार नहीं उतर पाते हैं तो भी रिश्ता टूटन की ओर बढ़ने लगता है। इसलिए बेहतर तो यह है कि आप अपने रिश्ते में रोमांच को बनाए रखें।
अब रश्मि और दीप्ति की दोस्ती को ही लें। दोनों एक-दूसरे के साथ करीब आठ साल से हैं। दोनों पक्के दोस्त हैं, बल्कि परिवार कहना ज्यादा बेहतर होगा। दीप्ति की जिंदगी में किसी का आगमन हुआ। जाहिर सी बात है दोनों का मिलना थोड़ा कम हो गया। रश्मि आठ साल की अपनी दोस्ती को यूं थोड़ा भी अलग होता नहीं देख पाई। वह बार-बार दीप्ति को फोन मिलाती और पूछती रहती कि वह कहां है। स्पेस न मिलने से दीप्ति का नाराज होना स्वाभाविक था। फलत: दीप्ति रश्मि से दूर होने लगी। यह स्पेस किसी भी रिश्ते को बनाए रखने, जोड़े रखने के लिए बेहद जरूरी होता है। रिश्ते में धोखा न हो, इसलिए बातचीत की पूरी आजादी होनी चाहिए। क्योंकि कहते हैं न कि बात करने से ही बात शुरू होती है।